मेरी धरोहर की पोस्ट्स

कैसे ये बच्चा सुधर गया...राजेश रेड्डी

यूँ देखिये तो आँधी में बस इक शजर गयालेकिन न जाने कितने परिन्दों का घर गयाजैसे ग़लत पते पे चला आए कोई शख़्ससुख ऐसे मेरे दर पे रुका और गुज़र गयामैं ही सबब था अबके भी अपनी शिकस्त काइल्ज़ाम अबकी बार भी ...  और पढ़ें
2 दिन पूर्व
मेरी धरोहर
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आँगन की चिड़िया....सीमा 'सदा'सिंघल

बेटी बाबुल के दिल का टुकड़ा भैया की मुस्कान होती है, आँगन की चिड़िया माँ की परछाईं घर की शान होती है !..खुशियों के पँख लगे होते हैं उसको घर के हर कोने मेंरखती है अपनी निशानियां जो उसकी पहचान होती ह...  और पढ़ें
3 दिन पूर्व
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वह सांप विषैला है तो मर क्यों नहीं जाता.....नूर मोहम्मद 'नूर'

जब शाम डराती है तो डर क्यों नहीं जातामैं सुब्ह का भूला हूं तो घर क्यों नहीं जाता।ये वक्त ही दुश्मन है सितमगर है, अगर तोमैं वक्त के सीने में उतर क्यों नहीं जाता।सिमटा है अंधेरों में उजाले की तरह ...  और पढ़ें
4 दिन पूर्व
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गूंगी मूर्तियाँ.....मंजू मिश्रा

ये गूंगी मूर्तियाँजब से बोलने लगी हैंन जाने कितनों कीसत्ता डोलने लगी हैजुबान खोली हैतो सज़ा भी भुगतेंगीअब छुप छुपा कर नहींसरे आम...खुली सड़क परहोगा इनका मान मर्दनकलजुगी कौरवों की सभासिर्फ ठ...  और पढ़ें
5 दिन पूर्व
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प्रश्न?.....मुकेश कुमार तिवारी

प्रश्न?हवा में तैरते हैंजैसे प्रकाश की किरण में झलकते हैधूल के कण अंधेरे कमरे मेंभले ही हम उन्हें देख नही पाये उजाले मेंप्रश्न?जमे रहते हैं किताबों की जिल्द परमेज की दराज मेंशर्ट के कॉलर परय...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
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उदास गीत कहाँ वादियों ने गाया है.......शकुन्तला श्रीवास्तव

चला है साथ कभी बादलों में आया हैये चाँद है कि मेरे साथ तेरा साया है।ये दर्द मेरा है, जो पत्तियों से टपका हैये रंग तेरा है, फूलों ने जो चुराया है।ये भीगी शाम, उदासी, धुँआ, धुँआ, मंज़रउदास गीत कहाँ, वा...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
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सहज गति बन जाये...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

जीवन गहन गहर सम लागे जितनो जीते जाओगहराई त्यों त्यों बढ़े जितनो वामें समाओ! दिव्य रोशनी ज्ञान की रस्सी वाय बनाओ पकड़ रास फिर उतरो गहरे तनि ना घबराओ !एकत्व रहे यदि भाव बिचसहज गति बन जाय...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
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आँकड़े......के.पी. सक्सेना ’दूसरे’

: मुक्तक :कल मरे कुछऔर कल मर जाएँगे कुछचल पड़ा है रोज़ का यह सिलसिला...............आँकड़ेबस बाँचते हैंहो इकाई या दहाईसैकड़ा या सैंकड़ोंहो गयी पहचान गायबबस लाश कितनी, ये गिनोक्या दुकालूक्या समारुऔर फुलब...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
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इश्क-ए - रवायत भारी है...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

रात अकेली चाँद अकेला गुजर रहा हें  सन्नाटा चँद्र किरण जल बीच समाई जल उतरा जो चाँद ज़रा सा ! लहर चंदनिया  झुला रही है एहसास -ए - दिल भी डोल रहा चिर - चिर  झींगुर सा सन्नाटा बन्द द्व...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
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नदी को सागर मिला नहीं है.....निर्मला कपिला

गिला-औ-शिकवा रहा नहीं हैमलाल फिर भी गया नहीं हैतलाश उसकी हुई न पूरीनदी को सागर मिला नहीं हैबुला के मुझको किया जो रुसवाये बज़्म की तो अदा नहीं हैये तो मुहब्बत लगी अलामतअलील दिल की दवा नहीं हैगुल...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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एक नन्ही सी नाजुक-नर्म कविता .....स्मृति आदित्य

रोज ही एक नन्ही सी नाजुक-नर्म कविता सिमटती-सिकुड़ती है मेरी अंजुरि में..खिल उठना चाहती है किसी कली की तरह...शर्मा उठती है आसपास मंडराते अर्थों और भावों से..शब्दों की आकर्षक अंगुलिय...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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स्याही से नहीं रुहानी लिखना.....कुसुम कोठारी

कोरे पन्ने पे कोरी कहानी लिखनास्याही से नहीं रुहानी लिखना उछल के समंदर से जो आया वो पानी लिखनाउस रुके पानी में फिर रवानी लिखनाकिताबों मे जो गुलाब थे वो निशानी लिखनाउन सुखे फूलों की खुशबू  ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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जाने क्यूँ !!!...................सदा

शब्दों की चहलकदमी सेआहटें आती रहींसन्नाटे को चीरताएक शोरकह जाता कितना कुछमौन ही !बिल्कुल वैसे हीमेरी खामोशियाँ आज भीतुमसे बाते करती हैंपर ज़बां ने खा रखा हैचुप्पी का नमककुछ भी कहने सेइंकार...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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वो उग आये................ शंकर सिंह परगाई

उग आते हैं तुम्हारे मन–मस्तिष्क के उन गीले कोनों पर जहाँ भी हल्की-सी सीलन है। वहाँ पनप जाते है वो  तुम्हारे भीतर तब तुम्हें उनकी ही तरह सही लगता है किसी एक रंग को ही सार...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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गुफ़्तगू इससे भी करा कीजे.....नीरज गोस्वामी

गुफ़्तगू इससे भी करा कीजेदोस्त है दिल ना यूँ डरा कीजेदर्द सह कर के मुस्कुराना हैआप घबरा के मत मरा कीजे जब सकूँ सा कभी लगे दिल मेंतब दबी चोट को हरा कीजे याद आना है ख़ूब आओ मगरमेरी आँखों से ना झर...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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पागल मन....लक्ष्मीनारायण गुप्त

शराब है, मस्ती है, बेफ़िक्री हैमगर साकी नहीं पास हैबिन साकी के शराब पीने मेंन मज़ा है, न हुलास हैसाकी को देखा तो नीयत बदल गईक्या कहूँ मेरी तक़दीर बिगड़ गईसाकी को यह बात बताऊँ कैसेना सुनने की हिम...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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नदी......रवीन्द्र प्रभात

उम्र के-एक पड़ाव के बादअल्हड़ हो जाती नदीऊँचाई-निचाई की परवाह के बग़ैरलाँघ जाती परम्परागत भूगोलहहराती- घहरातीधड़का जाती गाँव का दिलबेँध जाती शिलाखंडों के पोर -पोर अपने सुरमई सौंदर्य, भंवर ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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बात घर की रही नहीं घर की........निर्मला कपिला

मेरी शोहरत उड़ान तक पहुँचीफिर अना भी उफान तक पहुँचीबोझ घर का जो उम्र भर ढोयाज़िंदगी अब थकान तक पहुँचीअब न दूंगा उधार लिक्खा थामुफलिसी जब दुकान तक पहुँचीमैं बुरा था कसूर घर का क्याबात जो खानदान ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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नई पीढ़ी की पाठकीय आकांक्षाएँ....ऋचा वर्मा

पॉपुलर बनाम क्लासिक की बहसएक नया फिनोमिना हैबाज़ार तूलिका मापेगी उसेकोई भी रोमांचक भाव रह-रहकर कर उभरेगाअथवामनोरंजन की क्षमता बलवती होगीकि सहसा बह उठेगी 'यो-यो'की बहार..तब 'बुद्धिजीवी युवा प...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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हुई सुबह मुट्ठी में भर लेंगे नया आकाश ....श्रीमती मधु सिंघी

हुई सुबह मुट्ठी में भर लेंगे नया आकाश । उषा किरण होता नव सृजनमन प्रसन्न । मुझमें बेटी सदा प्रतिबिंबित छवि इंगित ।तपती धूपवृक्ष की घनी छाँव देती ठंडक ।सजाई अर्थी राग ,द्वेष व द...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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क्योंकि मन जिंदा है.....स्मृति आदित्य

मन परिंदा है रूठता है उड़ता है उड़ता चला जाता है दूर..कहीं दूर फिर रूकता है ठहरता है, सोचता है, आकुल हो उठता है नहीं मानता और लौट आता है फिर... फिर उसी शाख पर जिस पर विश्वास के ति...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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ताँका.....डॉ. सुरंगमा यादव

निज शक्ति काहनुमत को जब हुआ आभासपल में लाँघ लिया निस्सीम पारावार ।..................प्रकृति सदा निरत रहती है निज कार्यों में मनुज होकर तूव्यर्थ वक़्त बिताये।...................पथ बाधा से विचलित होकर ज...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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एक इंद्रधनुषी स्वप्निल रंगीला बचपन....कुसुम कोठारी

ख्वाबों के दयार पर एक झुरमुट है यादों काएक मासूम परिंदा फुदकता यहाँ वहाँ यादों का ।सतरंगी धागों का रेशमी इंद्रधनुषी शामियानाजिसके तले मस्ती में झूमता एक भोला बचपन ।सपने थे सुहाने उस परी लोक ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
मेरी धरोहर
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क्षणिकाएँ.......अनिता ललित

प्रेम की बेड़ियाँ... फूलों का हार,विरह के अश्रु...गंगा की धार,समझे जो वेदनाप्रिय के मन की... योग यही जीवन का...है यही सार !..............दिल की मिट्टी थी नम...जब तूने रक्खा पाँव...,अब हस्ती मेरी पथरा गयी..बस! बा...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
मेरी धरोहर
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अनुभूतियों के कच्चे फूल....स्मृति आदित्य

कच हरी दूब सा कोमल रिश्ता दंड भुगतता है नरम होने का और रौंदा जाता है जब-तब चाहे-अनचाहे... वक्त के पैरों तले।मुझसे तुम्हारा रिश्ताकच हरी दूब सा...रौंद दोगे तो चलेगा पर सूखने मत देना&n...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
मेरी धरोहर
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ललछौंही कोंपलें ...स्मृति आदित्य

रख दो इन कांपती हथेलियों पर कुछ गुलाबी अक्षर कुछ भीगी हुई नीली मात्राएं बादामी होता जीवन का व्याकरण, चाहती हूं कि उग ही आए कोई कविताअंकुरित हो जाए कोई भाव, प्रस्फुटित हो जाए कोई व...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
मेरी धरोहर
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बाग जैसे गूँजता है पंछियों से......ममता किरण

बाग जैसे गूँजता है पंछियों सेघर मेरा वैसे चहकता बेटियों सेघर में आया चाँद उसका जानकर वोछुप के देखे चूड़ियों की कनखियों सेक्या मेरी मंज़िल मुझे ये क्या ख़बरकह रहा था फूल इक दिन पत्तियों सेदिल का ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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एक स्पर्श.....मीना चोपड़ा

यहीं से उठता हैवह नगाड़ावह शोरवह नादजो हिला देता हैपत्थरों कोझरनों कोआकश कोवही सब जो मुझमेंधरा है।सिर्फ़ नहीं हैतो एक स्पर्शजहाँ से यह सबउठता है।-मीना चोपड़ानैनीताल...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
मेरी धरोहर
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मन कहीं खोना चाहता है............स्मृति आदित्य

खिले थे गुलाबी, नीले,हरे और जामुनी फूलहर उस जगहजहाँ छुआ था तुमने मुझे,महक उठी थी केसरजहाँ चूमा था तुमने मुझे,बही थी मेरे भीतर नशीली बयारजब मुस्कुराए थे तुम,और भीगी थी मेरे मन की तमन्नाजब उठकर च...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
मेरी धरोहर
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प्रेम और स्पर्श..............अमिता प्रजापति

प्रेम और स्पर्शमेरे दो बच्चे हैंस्पर्श कुछ अधिक चंचल हैदौड़ता है दूर-दूर तकपूछ-पूछ करपरेशान रखता हैदूसरा- प्रेम, जरागम्भीर हैबहुत संकट में ही मांपुकारता हैऔर अधिकतर समयखुद ही अपनीमां बना ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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