मेरी धरोहर की पोस्ट्स

दर्द.........विजय कुमार सप्पत्ति

जो दर्द तुमने मुझे दिए,वो अब तक सँभाले हुए हैं !!कुछ तेरी ख़ुशियाँ बन गई हैं कुछ मेरे ग़म बन गए हैं कुछ तेरी ज़िंदगी बन गए हैं कुछ मेरी मौत बन गए हैं जो दर्द तुमने मुझे दिए,वो अब तक सँभाले हुए ...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
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दस्तक दहलीज पर.................कुसुम कोठारी

दस्तक दे रहा दहलीज पर कोईचलूं उठ के देखूं कौन हैकोई नही दरवाजे परफिर ये धीरे धीरे मधुर थाप कैसीचहुँ और एक भीना सौरभदरख्त भी कुछ मदमाये सेपत्तों की सरसराहटएक धीमा राग गुनगुना रहीकैसी स्वर लहर...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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कभी न कभी....कुसुम कोठारी

मन की दहलीज परस्मृति का चंदा उतर आतायादों के गगन पर,सागर के सूने तट परफिर लहरों की हलचलसपनो का भूला संसारफिर आंखों में ,दूर नही सबपास दिखाई देते हैंन जाने उन अपनो केदरीचों मे भी कोईयादों का चं...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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दहलीज पर खड़ी औरत.....पद्मा मिश्रा

दहलीज पर खड़ी औरत,क्या सोचती है ?नम आँखों से निहारतीआकाश का कोना कोना,उड़ने को आकुल -व्याकुल, पंख तौलती है,तलाशती है राहें,मुक्ति के उस द्वार की,स्वप्न भरी आँखें,थामना चाहती हैं- क्षितिज के ओर छ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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देहरी...श्वेता सिन्हा

चित्र:साभार गूगलतन और मन कीदेहरी के बीचभावों के उफनतेअथाह उद्वेगों के ज्वार सिर पटकते रहते है।देहरी पर खड़ाअपनी मनचाहीइच्छाओं को पाने को आतुरचंचल मन,अपनी सहुलियत केहिसाब सेतोड़कर देहरी ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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दहलीज़.....सीमा "सदा"सिंघल

"दहलीज़"संस्कारों की भाषासभ्यता की दहलीज़ लांघने से पहलेहर शब्द के आगेएक लक्ष्मण रेखा खींच देती है...संवाद मन का मन सेकभी मौन रहकर,कभी आंखों की भाषा पढ़ती आँखेबिना कुछ कहेकितनी ही बातों को पहु...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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इक उमर का उनिंदा हूँ मैं....विकास शर्मा 'दक्ष'

उम्मीद-ए-वफ़ा की फितरत से शर्मिंदा हूँ मैं,ग़ज़ब कि दगा के हादसों के बाद ज़िंदा हूँ मैं,मुहब्बत से ऐतबार उठ गया अच्छे-अच्छों का,शिकस्त से हौसले आज़माने वाला चुनिंदा हूँ मैं,बिक गए ईमान जहाँ और गिरव...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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सौंधी गंध-बौछार कभी....डॉ. प्रेम लता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

ममता महकती बहकती कभी,सौंधी गंध-सी बौछार कभी।अंकुरित नव अंकुर कोमलफुहार से होते विभोर,कुम्हलाई आभा पर बाढ़ कभी,सौंधी गंध-बौछार कभी।मूक साधना ढलता सूरज,गहराती स्याही बेबसी लेकर।नील नभ से उठत...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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अंधो के शहर मे आईना बेचने आया हूं.....कुसुम कोठारी

फिर से आज एक कमाल करने आया हूं अंधो के शहर मे आईना बेचने आया हूं।संवर कर सुरत तो देखी कितनी मर्तबा शीशे मेंआज बीमार सीरत का जलवा दिखाने आया हूं।जिन्हें ख्याल तक नही आदमियत काउनकी अकबरी का पर...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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सेदोका...............डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

-0-रे कवि मन बस अब वीरों का कर अभिनन्दन भाए न मुझे बिंदिया या कजरे कंगन का वंदन।-0-लें केसरिया गूँज उठे धरती केसरी -सा गर्जन जागें जो सोए शावक सिंहनी के डरे, विद्रोही मन।-0-धवल कान...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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किनारे पर खड़ा क्या सोचता है.....अखिल भण्डारी

किनारे पर खड़ा क्या सोचता है समुंदर दूर तक फैला हुआ है ज़मीं पैरों से निकली जा रही है सितारों की तरफ़ क्या देखता है चलो अब ढूँढ लें हम कारवाँ इक बड़ी मुश्किल से ये रस्ता मिला है हमें तो खी...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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मौन.....श्वेता मिश्र

मौन मुखर प्रश्न मेरे उत्तर विमुख हुए जाते हैंस्याह सी रात के साएआ उन्हें सुलाते हैं नदिया चुप सी बहती हैचाँदनी मौन में निखरती हैअंतर्मन के उथल पुथल मेंमौन रच बस मचलती है मन का कोलाहलप्र...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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ओ पेड़....ललित कुमार

इस रचना में सूखे पेड़ की निश्चलता का वर्णन है। किस तरह यह अचल वृक्ष तमाम उम्र अपने चारों ओर होती गतिविधियों को देखता रहता है। गतिमान संसार में उसके करीब से तो लोग ग़ुज़रते हैं -लेकिन उसका अपना ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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ये कैसा संगीत रहा है....ललित कुमार

मैं बीत रहा हूँ प्रतिपलमेरा जीवन बीत रहा हैपल-पल के रिसते जाने सेजीवन-पात्र रीत रहा हैउसको पाने की ख़ातिर तोखुद से भी मैं बिछड़ चुका हूँमिला नहीं क्यों अब तक मुझकोजो मेरा मनमीत रहा हैपता नहीं ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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सोचिये अगली सदी को देंगे क्या....रवीन्द्र प्रभात

कांच के जज्बात, हिम्मत कांच कीयार ये कैसी है इज्जत कांच की ?पालते हैं खोखले आदर्श हम-माँगते हैं लोग मन्नत कांच कीपत्थरों के शहर में महफूज़ है-देखिये अपनी भी किस्मत कांच कीचुभ गया आँखों में मंज...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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अगन बरसती आसमां से....कुसुम कोठारी

अगन बरसती आसमां से जाने क्या क्या झुलसेगाज़मीं तो ज़मीं खुद तपिश से आसमां भी झुलसेगाजा ओ जेठ मास समंदर में एक दो डुबकी लगाजिस्म तेरा काला हुवा खुद तू भी अब झुलसेगाओढ़ के ओढ़नी रेत की  पसरेगा ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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चकल्लस...लक्ष्मीनारायण गुप्त

कभी सोचता हूँयह सारी चकल्लसछोड़के दुनिया सेसंन्यास ले लूँलेकिन क्या इससेकोई फरक पड़ेगासंन्यासी अपनी पुरानीअस्मिता को नकार देता हैअपना ही श्राद्ध कर देता हैलेकिन फिर नया नाम लेता हैनई अस्...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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जेठ की तपिश.....श्वेता सिन्हा

चित्र:-मनस्वी प्रांजलत्रिलोकी के नेत्र खुले जबअवनि अग्निकुंड बन जाती वृक्ष सिकुड़कर छाँह को तरसेनभ कंटक किरणें बरसातीबदरी बरखा को ललचाती  जब जेठ की तपिश तपाती उमस से प्राण उबलता पल-पल...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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मुझे बचपन की कुछ यादें.....रईस अमरोहवीं

तिरा ख़याल कि ख़वाबों में जिन से है ख़ुशबू वो ख़्वाब जिन में मिरा पैकर-ए-ख़याल है तू। सता रही हैं मुझे बचपन की कुछ यादेंवो गर्मियों के शब़-ओ-रोज़ दोपहर की वो लू। पचास साल की यादों के नक़्श ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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रेगिस्तानी प्यास......गीतकार जानकीप्रसाद 'विवश'

आज भुनने लगी अधर है , रेगिस्तानी प्यास।रोम रोम में लगता जैसे , सुलगे कई अलाव ।मन को , टूक टूक करते,ठंडक के सुखद छलाव ।पंख कटा धीरज का पंछी ,लगता बहुत उदास।महासमर का दृश्य ला रही है,शैतान लपट ।ध...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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छांह भी मांगती है पनाह....अश्वनी शर्मा

रेगिस्तान में जेठ की दोपहर किसी अमावस की रात से भी अधिकभयावह, सुनसान और सम्मोहक होती हैआंतकवादी सूरज के समक्ष मौन हैआदमी, पेड़, चिड़िया, पशुकोई प्रतिकार नहीं बस ढूंढते हैं मुट्ठीभर छांहआ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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आदत बुरी है ...डॉ. इन्दिरा गुप्ता

उनकी नजरों मैं हमने देखा बला की चाहत छुपी हुई है छलक के आँसू निकल के बोला यही तो आदत बड़ी बुरी है ! चलते चलते मुंडे अचानक तिरछी नजर से जो हमको देखा भीगे से लब मुस्कुरा के बोले कहके ना ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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ना कर नाटक

ना कर नाटक कहा ना, ना कर नाटक बिना  टिप्पणी....सादर...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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ठंडी बयार का झोंका....कुसुम कोठारी

मां को काट दोगेमाना जन्म दाता नहीं हैपर पाला तुम्हें प्यार सेठंडी छांव दी प्राण वायु दीफल दियेपंछिओं को बसेरा दियाकलरव उनका सुन खुश होते सदाठंडी बयार का झोंकाजो लिपटकर उस से आताअंदर तक एक शी...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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पेड़ बचाओ,जीवन बचाओ...श्वेता

हाँ,मैंने भी देखा हैचारकोल की सड़केंफैल रही ही हैसुरम्य पेड़ों से आच्छादितसर्पीली घाटियों में,सभ्य हो रहे है हमनिर्वस्त्र,बेफ्रिक्र पठारों केछातियों को फोड़कर समतल करते,गाँवों की सँकरीपगडंड...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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पेड़ लगाओ पानी बचाओ , कहता सब संसार !....नामालूम

धूप सिपाही बन गई  , सूरज थानेदार !गरम हवाएं बन गईं  , जुल्मी  साहूकार !!:शीतलता शरमा  रही , कर घूँघट की ओट !मुरझाई सी छांव है , पड़ रही लू की चोट  !!:चढ़ी दुपहरी हो गया , कर्फ़्यू जैसा हाल !घर भीतर स...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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कुछ फुटकर श़ेर....आलोक यादव

अब भी सोफे में है गर्मी बाक़ी वो अभी उठ के गया हो जैसे ***वाइज़ सफ़र तो मेरा भी था रूह की तरफ़पर क्या करूँ कि राह में ये जिस्म आ पड़ा ***न वो इस तरह बदलते न निगाह फेर लेते जो न बेबसी का मेरी उन्हें ऐत...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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पाब्लो पिकासो और उसकी पेंटिंग..संकलित

पाब्लो पिकासो स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!!एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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माँ है अनुपम....डॉ. कनिका वर्मा

माँ है अनुपममाँ है अद्भुतमाँ ने नीर बनमेरी जड़ों को सींचाऔर उसी पानी सेमेरे कुकर्म धोएमाँ ने वायु बनमेरे सपनों को उड़ान दीऔर उसी हवा सेमेरे दोषों को उड़ा दियामाँ ने अग्नि बनमेरी अभिलाषाओं क...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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किया "इजहारे"मुहब्बत....कुसुम कोठारी

शाहजहां ने बनवाकर ताजमहलयाद मे मुमताज के, डाल दिया आशिकों को परेशानी मे।आशिक ने लम्बे "इंतजार"के बाद किया "इजहारे"मुहब्बत"नशा"सा छाने लगा था दिलो दिमाग पर कह उठी महबूबा अपने माही सेकब बने...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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