मंथन की पोस्ट्स

"मुक्तक"

( 1 )खट्टी-मीठी यादें भूल ,आगे की सोचते हैं ।कुछ अपनी कहते हैं , कुछ सब की सुनते हैं ।खुद को खुश रखने का ,कोई अवसर ढूंढते हैं ।हो सब की आशाएँ पूरी ,ऐसा ख्वाब देखते हैं ।                ...  और पढ़ें
5 दिन पूर्व
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“छुवन”(हाइकु)

शरद ऋतुछुवन तुहिन कीसिहरन सीवसन्तोत्सवछुवन बयार कीलागे भली सीऋतु पावसछुवन फुहार कीमुदित धराजननी तेरीछुवन ममता कीपूर्णता मेरीनेह के नातेछुवन निजत्व की मन को भायेओ मातृभूमि !छुवन गौरव कीत...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
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"हम सब"

सब के सब एक साथरह लें मिल करभला.., ऐसा कब होता है ।आदमी की आदत भीपंछियों सरीखी है ।पंख मिले नही किनिकल पड़े नीड़ सेखुद की तलाश में…, कभी असीम अनन्त गगनतो कभी सुदूर क्षितिज ।अपनों का अभावतीर सा सालत...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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"आशियाना"

बेगाने घरों  में रह कर मुझे कैसा लगता है ।ख्वाबों में आकर अक्सरमेरा हाल पूछता है ।कहाँ रहती हूँ आजकलमुझ से मेरा घर पूछता है ।अपने  जो थे वो सबतिनकों से बिखर गए ।दुनिया के बाजार मेंअजनबी ही ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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“अभिलाषा”

अभिनन्दनहर्षित जन गणबीति बिसारआगत का स्वागतवर्ष नवलसमय अविरलसत्य अटलहो कर गतिमानकरें उर्जितअपने मन प्राणमंगलमयलक्ष्य करें संधानओ वसुन्धरा!ह़ो प्रसन्न वदनदो वरदानउपजे धन-धान्यधरती पुत...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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"तुम"

तुम इतने चुप क्यों रहते हो ? मन ही मन में क्या सहते हो ?सब में शामिल अपने में गुम ।उखड़े-उखड़े से दिखते हो ।।टूटा है यदि दिल तुम्हारा ।गम की बातें कह सकते हो ।।मन में अपने ऐंठ छुपाए ।सब से सुन्दर तुम ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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"तुम्हारे लिए'

अपनी उम्र के गुजारे सारे बरस ,मैनें तुम्हारी झोली में बाँध दिए हैं ।खट्टी - मीठी गोली वाले ,नीम की निम्बौरी वाले ।जो कभी तुम्हारे साथ ,तो कभी अपने आप जीए हैं ।मेरे बचपन वाले दिन ,जरा संभाल कर रखना...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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"चिन्तन"(चोका)

क्षणभंगुरअपना ये जीवनशून्य जगतजीवन का पहिया कोल्हू सा लागेमानव बँध भागेसूझे ना आगेमुझसे मन पूछेखुद का स्वत्वमैं दृगों में अटकाअश्रु बिन्दु साबन के खारा जलबिखर जाऊँकोमल गालों परया बन जाऊँ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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"कसौटी"

वादों का अब दौर गया।सीखेंगे फिर हुनर नया ।।किस किस पर यकीं करें ।मन में सब के द्वेष भरा ।।सच्चाई का भान नही।बेमतलब का शोर मचा ।।जितने मुँह उतनी बातें ।अपने में हर एक खरा ।।काई वाली राहें  आगे...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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"अन्तर्द्वन्द्व" (माहिया)

कुछ तीखी लगती  हैंलोगों की बातेंलगने पर दुखती हैंतुम से कुछ कहना हैहो चाहे कुछ भीबस यूं ही रहना हैचल आगे बढ़ते हैंकरना क्या है अबबस राह पकड़ते हैंकरनी अपने मन कीसुर  सबका अपनाअपनी अपनी ढफल...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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"उलझन"

अपनी कुछ ना कहता है मन ।खुद में  डूबा रहता है  मन ।।खामोशी की मजबूरी क्या  ?मुझसे कुछ ना कहता है मन ।।शोर मचाती इस दुनिया में ।चुप्पी से सब सहता है मन ।।इठलाती चंचल नदिया की ।धारा बन कर बहता ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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'हाइकु"

"ऊषा स्वस्ति"सिमट गयानींद के आगोश मेंभोर का तारासृष्टि के रंगऊषा की लाली संगनिखर गएगीली सी धूपहँसते दिनकरचहके पंछीनव आरम्भजागे जड़-चेतनप्रातः वन्दन XXXXX...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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"उलझन"(तांका)

पीर पराईसमझो तो समझेतुम्हें खुद केसुख-दुख का साथीजीवन अनुरागीमन ये मेराअभिव्यक्ति विहीनभ्रम मोह केमुझ से न सुलझेंउलझे से बंधन कुछ ना कहो नयन बोलते हैंमन की वाणीबिन बोले कहते अनसुलझी बातें...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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"रूमानी हो जाएँ "

झील का किनारा और ऊँचे पहाड़हरी-भरी वादी में वक्त बितायें ।मन ने ठानी है आजहम भी रूमानी हो जाएँ ।।ओस में डूबी कुदरतऔर एस्किमोज बने हम ।डाले जेबों में हाथमुँह से भाप उड़ाएँ ।।सोने सी बिखरी सैकतरे...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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"फिक्र"

मेरी कुछ यादें और उम्र के अल्हड़ बरस ।अब भी रचे-बसे होंगें उस छोटे से गाँव में ।।जिसने ओढ़ रखी है बांस के झुरमुटों की चादर ।और सिमटा हुआ है ब्रह्मपुत्र की बाहों में ।।आमों की बौर से लदे सघन कुंजों...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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"माहिया"

कुछ गुजरे दिन दीखेतुम से मिलने पर विकसे कमल सरीखेअपनी नेह कहानी जानी पहचानीलगती सरल सुहानीऐसे कुछ ना सोचोकुछ पल रह कर चुपसब सुन कर कुछ बोलो रेशम के धागे हैंजग के रिश्तों मेंकितनी ही गांठें ह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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"मुक्तक"

  ( 1 )तेरे सारे ख़त मैंने कल जला दिए ।यादों के निशां दिल से मिटा दिए ।।आज आकर फिर यूं  सामने मेरे ।गुजरे पल फिर क्यों दोहरा दिए ।।                      ( 2 )मैं तुझ पे यकीन करूं कैस...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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“पूर्णमासी” ( चोका)

लुप्त चन्द्रमाबादलों की ओट मेंकाली घटाएँटिप टिप बरसेमन आंगनसावन भादौ साभीगा ही भीगानेहामृत छलकेनेह घट सेअश्रु बूँद ढलकेपूनम यामानभ घन पूरितचाँदनी को तरसे XXXXX...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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आज और कल

जब से मिट्टी के घड़ों का चलन घट गया ।तब से आदमी अपनी जड़ों से कट  गया ।।कद बड़े हो गए इन्सानियत घट गई ।जड़ें जैसे अपनी जमीं से कट गई ।।खाली दिखावा रह गया नेह कहीं बह गया ।अपनेपन की जगह मन भेद जम ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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"प्रभात वेला” ( तांका )

( 1 ) उजली हँसीखन खन खनकीसुन के लगाभोर वेला में कहींकलियाँ सी चटकी ( 2 ) एक टुकड़ासुनहरी धूप काछिटक गयामन के आंगन मेंचपल हिरण सा ( 3 )बिखर गईअंजुरी भर बूँदेंओस कणों कीधुली धुली नि...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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"त्रिवेणी"

( 1 ) गीली रेत पर कभी उकेरी थी एक तस्वीर ।समेट ले गई सब कुछ वक्त की लहर ।बस कुछ शंख सीपियों के निशान बाकी हैं ।।( 2 ) कभी कभी बेबाक हंसी ।बेलगाम झरने सरीखी होती है ।गतिरोध आसानी से हट जाया करते हैं ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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"माहिया" ( स्वीकारोक्ति )

(1) बचपन कब बीत गयाइस के जाने सेमन मेरा रीत गया(2) मैं तो बस ये जानूंतुम को  ही अपनासच्चा साथी मानूं (3) लम्बी बातें कितनीनापूं तो निकलेगहरी सागर जितनी (4) मैं याद करूं क्या क्याबीच हमारे थींस...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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“सीख” (रोला छंद)

विषम चरण  - ११ मात्राएंसम चरण  - १३ मात्राएं( १ )   मन ने ठानी आज , सृजन हो नया पुराना ।        मिली-जुली हो बात , लगे संगम की धारा ।।( २ )   हो सब का सम्मान , कर्म कुछ ऐसे कीजै ।   &nb...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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"जीवन रंग"

भोर का तारा जा सिमटानींद के आगोश में ।अरूणाभ ऊषा नेछिड़क दिया सिंदूरी रंगकुदरत के कैनवास पर ।पूरी कायनात सज गईअरूणिम मरकती रंगों से ।भोर की भंगिमा निखर गईप्रकृति के विविध अंगों से ।सात रंगो...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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"वक्त"

वक्त मिला है आज , कुछ अपना ढूंढते हैं ।करें खुद से खुद ही बात , अपना हाल पूछते  हैं ।।कतरा कतरा वक्त , लम्हों  सा बिखर गया ।फुर्सत में खाली हाथ , उसे पाने को जूझते हैं ।।दौड़ती सी जिंदगी , यकबयक थ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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“तृष्णा”

अभिव्यक्ति शून्य , भावों से रिक्त ।तृष्णा से पंकिल , ढूंढता असीमित ।।असीम गहराइयों में , डूबता-तिरता ।निजत्व की खोज में ,रहता सदा विचलित ।।दुनियावी गोरखधंधों से , होता बहुत व्यथित ।सूझे नही रा...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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"लघु कविताएं"

( 1 )तुम्हारे और मेरे बीच एक थमी हुई झील हैजिसकी हलचल जम सी गई है ।जमे भी क्यों नहीं…..,मौसम की मार सेधूप की गर्माहटहमारे नेह की आंच की मानिंदबुझ सी गई है । ( 2 )सांस लेने दो इस कोशब्दों पर बंधन क...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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"कब तक”

नैन हमारे तकते राहें ,जाने तुम आओगे कब तक ।जाओ तुम से बात करें क्यों , साथ हमारा दोगे कब तक ।।ना फरमानी फितरत पर हम , बोलो क्योंकर गौर करेंगे ।तुम ही कह दो जो कहना है , हम से और लड़ोगे कब तक ।।बेमतलब ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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"हिन्दी दिवस"

चलिए हम सब आज ,हिन्दी में बात करते हैं१४ सितम्बर का नाम ,हिन्दी दिवस रखते हैंकरें कुछ सभाएं , दिखाएं कुछ ठसक अपनीआती तो नहीं फिर भी, बस थोड़ी सी समझते हैंसमझते क्यों नहीं है आप …,बूढ़ी हो गई है हिन...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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"जल”

हरहराता ठाठें मारताप्रकृति का वरदान है जल ।जीवन देता प्यास बुझातानद-निर्झर में बहता है जल ।।जो ये बरसे मेघ बन करखिले धरा दुल्हन बन कर ।उस अम्बर का इस धरती पर   छलके ये अनुराग बन कर ।।सीप म़े...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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