मंथन की पोस्ट्स

"मुक्तक"

                       (1) कुछ तुम कहो कुछ मैं कहूँ , बाकी सब बातें जाओ भूल ।बेकार की है दुनियादारी , नही होते इस से कुछ दुख दूर ।।औरों की बात करो मत तुम , सब अपनी अ...  और पढ़ें
7 दिन पूर्व
मंथन
0

"सांझा - चूल्हा"

सब को लेकर साथ चलना सब के मन की बात पढ़ना आसान नहीं कठिन सा है ।बेसब्री और केवल मेरी 'मैं’औरों के सिर पर पांव रख करकेवल अपना भला सोचती है ।कभी - कभी सोचती हूंजगह -जगह सांझा - चूल्हारेस्टोरेंट्स तो...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
मंथन
1

"मुलाकात"

हम तो मिलने के बहाने आ गए ।दोस्ती को आजमाने आ गए ।।मिलने का वादा था चांद रात का ।वो वादा  तुम से निभाने आ  गए ।।चांद के दीदार का बहाना बना।दोस्ती का कर्ज चुकाने आ गए ।।सीढ़ियों पर भाग कर आते क...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
मंथन
3

"मुक्तक"

                 (1)कड़वा सुनो फिर भी मुस्कुराओ तो जाने ।रंजिशो के बाद भी साथ निभाओ तो जाने ।।औरों को उपदेश देना होता है बहुत आसान ।कभी खुद पे भी आजमाओ तो जाने ।।                  (2)&nb...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
मंथन
3

"एक दिन पहाड़ों वाला"

पहाड़ों के ठाट भी बड़े निराले हैंमरकत और सब्ज रंगों से सजेअपनी ही धुन में मगन ।कुदरत ने भी दोनों हाथों सेेनेह की गागर इन परबड़े मन से छलकी है ।सांझ होते ही बादलों की टोलियां इनकी ऊंची चोटियों ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
मंथन
5

“कशमकश”

फुर्सत के लम्हे रोज़ रोज़ मिला नहीं करते ।सूखे फूल गुलाब के फिर खिला नहीं करते ।।छूटा जो  हाथ एक बार दुनिया की भीड़ में ।ग़लती हो अपने आप से तो गिला नहीं करते ।।आंधियों का दौर है , है गर्द ओढ़े ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
मंथन
6

"मुक्तक"

( 1 )सहमति  हो किसी बात के लिए भी ।संभव नहीं ये किसी के लिए भी ।।कई बार मौन भी ओढ़ना पड़ता है ।सब के अमन-चैन के लिए भी ।।                                  ( 2 )निहारना चांद को भला स...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
मंथन
4

"गुफ्तगू" (ताँका)

    ( 1 )समय चक्रकुछ पल ठहरेतो मैं चुन लूंस्मृतियों के  वो अंशछूटे है यहीं कहीं       ( 2 )वक्त के साथनिश दिन चलतेथका है मनप्रतिस्पर्धी होड़ से रूक कर सुस्ता लूं     ( 3 )मेरे अपनेतेरा हाथ ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
मंथन
4

"एक चिट्ठी"

गर्मी की छुट्टियों की दोपहरऔर मेरे गुड्डे-गुड़ियों के ब्याह में ।मुझे तुम्हारी टोका-टाकीअच्छी नही लगती थी ।।मगर तुम भी यह अच्छे से जानती थी कि मैं ।तुम्हारे प्यार के बिना इस दुनिया‎ मेंनिता...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
मंथन
3

"घर"

बहुत बरस बीतेबचपन वाला घर देखे ।अक्सर वह सपने में  मुझ सेमिलने बतियाने आ ही जाता है ।।पिछली बार मिला था तोबड़ा  वीरान और खामोश था ।उम्र तो पहले भी अधिक ही थीअब तो और भी बूढ़ा हो गया है ।।वक्त ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
मंथन
2

"क्षणिकाएँ"

          ( 1 )अच्छी लगीतुम्हारी आवाज मेंलरजती मुस्कुराहट ।बहुत दिन बीते यहदुनियादारी की भीड़ मेंखो सी गयी थी ।।    ( 2 )जागती आँखों से देखेख़्वाब पूरा करने की जिद्दअक्सर दिख...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
2

"प्रकृति" (हाइकु)

ढलती सांझघिर आए बादलभीगी सी रातें ।            भोर के साथकरते कलरवपेड़ों पे पंछी ।ओस की बूदेंमकड़ी के जालों मेंमोती सी गुंथी ।छाया उल्लासपुलकित वसुधाअम्बर हँसा ।ये सारे दृश्...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
4

"प्रश्न"

कुछ दिन से मन उदासऔर अभिव्यक्ति‎ खामोश हैसमाज में असुरक्षा की सुनामी नेसोचों का दायरा संकुचित औरजीवन पद्धति का प्रतिबिम्बधुंधला कर दिया हैकोमलकान्त पदावली के साथप्रकृति और जीवन दर्शनमें ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
3

“उपालम्भ"

अवसर मिला “तिब्बतियन मॉनेस्ट्री” जाने का । तिब्बतियन शैली में बने भित्तिचित्रों में भगवान बुद्ध‎ के जीवन-चरित और उनकी भव्य प्रतिमा को देख मन अभिभूत हो उठा । स्कूल लाइब्रेरी में स्व.श्री मैथ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
3

"आँख-मिचौली”

नहाया धोया …, गीला सा चाँद उतर आया है , क्षितिज छोर पर थोड़ी देर में खेलेगा हरसिंगार की शाख पर आँख-मिचौलीझूलती डाल और फूल-पत्तियों सेआधी सी रात में…………,जब आ जायेंगे, नील गगन मेंअनगिनत तारे, तो मन...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
4

"त्रिवेणी"

(1)मीलों लम्बी‎ बातें जब चलती हैं तो रुकती  नही ,रील में बन्धे धागे सी खुलती ही चली जाती हैं ।बरसों साथ जीया वक्त लम्हों में कहाँ सिमटता है ।।                  &...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
3

“त्रिवेणियाँ”

  (1)अधपकी रोटी का कोर खाते उसकी आँखों‎ में नमीऔर जुबां पे छप्पन भोग का स्वाद घुला है ।बेटी के हाथों सिकी पहली रोटी मां की थाली में है ।।                     &nbs...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
8

अहसास” (तांका)

जब रूह सेकोरे कागज परउतरते हैंमूक अहसास तोकहानी बनती हैबिन बोले हीमहसूस करे जोअनसुलझेमन के जज्बात तोकहानी बनती हैअहसास हैंसंवेगों का दरियासुगमता सेबंधे मन छोर तोकहानी बनती हैXXXXX...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
7

"लहर"

हरहराती  शोर मचातीदूध सा उफान खाती ताकत के गुरूर में उन्मुक्तलहर ……,नाहक गर्जन तर्जन करती हैंशुक्ल पक्ष का दौर है और समय भी परिवर्तन‎ शीलआज नही तो कलबदल ही जाएगाफिर तेरा यह अल्हड़ सा उमड़ता...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
8

"तांका" (उलाहना)

(1)क्यों तुम्हें नेहजताना पड़ता हैसमझो कभी‎बातें अपने आपमेरे अन्तर्मन की    (2)यूं तो तुमसेकोई गिला नही हैबिना बतायेखामोशियों के पुलदूरी बढ़ा‎ देते हैं   xxxxx...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
14

“कब बोलोगी”

बहुत दिनों बाद अपने  गाँव जाना हुआ तो पाया कि शान्त‎ सा कस्बा अब छोटे से शहर में तब्दील हो गया और बस्ती‎ के चारों तरफ बिखरे खेत -खलिहान सुनियोजित बंगलों और कोठियों के साथ-साथ शॉपिंग सेन्टरों ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
12

"अपने पराये"

(This image has been taken from google)पेड़ों की डाल सेटूट कर गिरे चन्द फूल‎अलग नही हैब्याह के बाद  की बेटियों सेआंगन तो है अपना हीपर तब तक हीजब तक साथ थाडाल और पत्तियों‎ काअब ताक रहे हैं एक दूसरे  को यूंजैसे  घर ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
7

"अजनबी"

बड़े अजनबी होते हैं शहरहाथ बढ़ा‎ओ तो भी दोस्ती नही करते बसअपनी ही झोंक में रहते हैं गाँव के तो पनघट भी बोलते हैंकभी कनखियों से तो कभी मुस्कुरा  केफुर्सत हो तो हवा के झोकों संगकभी कभी हाल-चाल ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
12

“शिव स्तुति” (हाइकु)"

जै त्रिपुरारिजै जै शिव शंकरभोले भण्डारीकाशी के वासीजै नीलकंठधरत्रिनेत्र धारीजै गंगाधरप्रकृति के रक्षकशशि शेखरगौरी के प्रिय‎कैलाश अधीश्वरविष्णु वल्लभकरें वन्दनयक्ष, देव, गन्धर्वजड़- च...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
12

“चाँद"

चाँद निकलता है रात में, लेकिन कभी कभी‎यह दिन में भीदिखता है ।फर्क बस इतना हैरात वाला चाँद,धुला धुला सानिखरा और उजला सा ,पेड़ों की फुनगियों से झांकता दुख में दुखीऔर खुशियो में ...., "चार चाँद ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
9

"ताँका"

ताँका (短歌) जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य विधा है। ताँका पाँच पंक्तियों और ५+७+५+७+७=३१ वर्णों के लघु कलेवर में भावों को गुम्फित करना सतत अभ्यास और सजग शब्द साधना से ही सम्भव है। इसमें यह ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
10

"भड़ास"

भौगोलिक परिवेश मेंधरती की हलचल ।अन्दरुनी परतों केखिसकने का हालबयान करती है ।अन्दर सब कुछ‎ ठीक !!‎मगर सब ठीक कहाँ होता है ?धरा  को तो ध्वंस झेलना ही पड़ता है ।इन्सान की भड़ास भीवसुन्धरा की इसह...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
12

"26 जनवरी” (गणतन्त्र दिवस)

हर्षोल्लास में डूबे स्वर……,आज से ग्राउण्ड में जाना है “26 जनवरी"की तैयारी के लिए‎ । और फिर वह चिरप्रतीक्षित दिन….., मुँह अंधेरे अपनी अपनी स्कूलों की तरफ लकदक करती यूनिफॉर्म पहने भागते बच्चे……,र...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
11

"आदत"

आदत सी हो गई‎ हैअपने में‎ खो जाने की ।खुद से मनमानी करने कीफिर अपने को समझाने की ।कल्पनाओं के कैनवास परकल्पित लैण्ड स्केप सजाने की ।सोचों की भँवर में उलझी हुईअनसुलझी गिरहें सुलझाने की ।बेमतल...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
11

"वो"(3)

(भाग तृतीय)मौहले भर में प्रसिद्ध था कि बरजी काकी चूंकि बचपन में ही ससुराल आ गई  और घर में सबकी दुलारी थी इसलिए स्वभाव में स्त्रीगत गुणों का अभाव व पुरुषोचित गुणों का बाहुल्य था। दिखने में शान...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
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