मंथन की पोस्ट्स

“त्रिवेणियाँ”

  (1)अधपकी रोटी का कोर खाते उसकी आँखों‎ में नमीऔर जुबां पे छप्पन भोग का स्वाद घुला है ।बेटी के हाथों सिकी पहली रोटी मां की थाली में है ।।                     &nbs...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
मंथन
5

अहसास” (तांका)

जब रूह सेकोरे कागज परउतरते हैंमूक अहसास तोकहानी बनती हैबिन बोले हीमहसूस करे जोअनसुलझेमन के जज्बात तोकहानी बनती हैअहसास हैंसंवेगों का दरियासुगमता सेबंधे मन छोर तोकहानी बनती हैXXXXX...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
मंथन
4

"लहर"

हरहराती  शोर मचातीदूध सा उफान खाती ताकत के गुरूर में उन्मुक्तलहर ……,नाहक गर्जन तर्जन करती हैंशुक्ल पक्ष का दौर है और समय भी परिवर्तन‎ शीलआज नही तो कलबदल ही जाएगाफिर तेरा यह अल्हड़ सा उमड़ता...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
मंथन
5

"तांका" (उलाहना)

(1)क्यों तुम्हें नेहजताना पड़ता हैसमझो कभी‎बातें अपने आपमेरे अन्तर्मन की    (2)यूं तो तुमसेकोई गिला नही हैबिना बतायेखामोशियों के पुलदूरी बढ़ा‎ देते हैं   xxxxx...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
मंथन
12

“कब बोलोगी”

बहुत दिनों बाद अपने  गाँव जाना हुआ तो पाया कि शान्त‎ सा कस्बा अब छोटे से शहर में तब्दील हो गया और बस्ती‎ के चारों तरफ बिखरे खेत -खलिहान सुनियोजित बंगलों और कोठियों के साथ-साथ शॉपिंग सेन्टरों ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
9

"अपने पराये"

(This image has been taken from google)पेड़ों की डाल सेटूट कर गिरे चन्द फूल‎अलग नही हैब्याह के बाद  की बेटियों सेआंगन तो है अपना हीपर तब तक हीजब तक साथ थाडाल और पत्तियों‎ काअब ताक रहे हैं एक दूसरे  को यूंजैसे  घर ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
5

"अजनबी"

बड़े अजनबी होते हैं शहरहाथ बढ़ा‎ओ तो भी दोस्ती नही करते बसअपनी ही झोंक में रहते हैं गाँव के तो पनघट भी बोलते हैंकभी कनखियों से तो कभी मुस्कुरा  केफुर्सत हो तो हवा के झोकों संगकभी कभी हाल-चाल ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
7

“शिव स्तुति” (हाइकु)"

जै त्रिपुरारिजै जै शिव शंकरभोले भण्डारीकाशी के वासीजै नीलकंठधरत्रिनेत्र धारीजै गंगाधरप्रकृति के रक्षकशशि शेखरगौरी के प्रिय‎कैलाश अधीश्वरविष्णु वल्लभकरें वन्दनयक्ष, देव, गन्धर्वजड़- च...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
7

“चाँद"

चाँद निकलता है रात में, लेकिन कभी कभी‎यह दिन में भीदिखता है ।फर्क बस इतना हैरात वाला चाँद,धुला धुला सानिखरा और उजला सा ,पेड़ों की फुनगियों से झांकता दुख में दुखीऔर खुशियो में ...., "चार चाँद ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
5

"ताँका"

ताँका (短歌) जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य विधा है। ताँका पाँच पंक्तियों और ५+७+५+७+७=३१ वर्णों के लघु कलेवर में भावों को गुम्फित करना सतत अभ्यास और सजग शब्द साधना से ही सम्भव है। इसमें यह ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
6

"भड़ास"

भौगोलिक परिवेश मेंधरती की हलचल ।अन्दरुनी परतों केखिसकने का हालबयान करती है ।अन्दर सब कुछ‎ ठीक !!‎मगर सब ठीक कहाँ होता है ?धरा  को तो ध्वंस झेलना ही पड़ता है ।इन्सान की भड़ास भीवसुन्धरा की इसह...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
8

"26 जनवरी” (गणतन्त्र दिवस)

हर्षोल्लास में डूबे स्वर……,आज से ग्राउण्ड में जाना है “26 जनवरी"की तैयारी के लिए‎ । और फिर वह चिरप्रतीक्षित दिन….., मुँह अंधेरे अपनी अपनी स्कूलों की तरफ लकदक करती यूनिफॉर्म पहने भागते बच्चे……,र...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
6

"आदत"

आदत सी हो गई‎ हैअपने में‎ खो जाने की ।खुद से मनमानी करने कीफिर अपने को समझाने की ।कल्पनाओं के कैनवास परकल्पित लैण्ड स्केप सजाने की ।सोचों की भँवर में उलझी हुईअनसुलझी गिरहें सुलझाने की ।बेमतल...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
6

"वो"(3)

(भाग तृतीय)मौहले भर में प्रसिद्ध था कि बरजी काकी चूंकि बचपन में ही ससुराल आ गई  और घर में सबकी दुलारी थी इसलिए स्वभाव में स्त्रीगत गुणों का अभाव व पुरुषोचित गुणों का बाहुल्य था। दिखने में शान...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
10

"वो" (2)

  (द्वितीय भाग)आजकल लड़कियों के उत्थान और शिक्षा-दीक्षा के प्रचलन पर बड़ा जोर है ,साक्षरता का प्रतिशत भी उर्ध्वमुखी हो गया है लेकिन चालीस-पचास साल पहले हालात कुछ और ही हुआ करते थे। लड़कियों को शि...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
14

"वो"

(प्रथम किश्त)वो हरे ,नीले कपड़ों के थान खुलवाए अपनी दो अंगुलियों की पोरों के बीच घूंघट थामे पारखी नजरों से कपड़े की किस्म भांप रही थी । बड़ी देर बाद उसने हरे रंग का कपड़ा पसन्द किया अब बारी ओढ़नी की थी...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
10

"समय"

और एक आज             कल में बीत गया ।और एक सालगत में बदल गया ।जो आज हैउसकी नींव ।जो कल थाउस पर टिकी है ।और जो आएगाउसकी आज पर ।दिन , महिने , सालयूं ही गुजरते हैं ।एक दूसरे से बँधेएक दूसरे के सा...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
10

"दुनियादारी"

                   दुनियादारी का गोरखधन्धाअपने आप में अनोखा है ।गाठें पहले भी लगती थीकभी खेल-कूद मेंतो कभी‎ किसी बंटवारे पर ।राग-द्वेष मन के साथआँखों में भी उतर आया करता था ।मगर गिरहे...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
10

“शीत ऋतु”

(This image has been taken from google)गीली सी धूप मेंफूलों की पंखुड़ियांअलसायी सीआँखें खोलती हैं ।ओस का मोती भीगुलाब की देह परथरथराता साअस्तित्व तलाश‎ता है ।कोहरे की चादर में लिपटे घर-द्वार औरपगडंडियां भी सहमी ठ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
11

"मैं"

                 है तो छोटा सामगर सत्ता‎असीम और अनन्त ।समाया है समूचे संसार में औरगीता के सार में“अहम् ब्रह्मास्मि”सब कुछ ईश्वर‎मयकर्म भी , फल भी ।बड़ा कालजयी हैद्वापर से त्रेतायुग,स...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
17

"त्रिवेणी"

                   (1)कुदरत की आँखें‎ नम और मनस्थिति कुछ गमगीन हैएक और  दिवस बीता एक और युग अवसान हुआ ।नश्वरता की प्रकृति  प्रकृति‎ को भी कहाँ भाती है ।।              &n...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
13

"आदत"

उम्र‎ का आवरणमंजिल का फासलातय करते  करते‎थक सा गया हैकदमों की लय भी विराम चाहती हैंआदत है कि…..,आज भी चाँद केसाथ साथ चलती हैंपानी से भरी बाल्टी मेंबादलों की भागती परतेंआज भी वैसे ही उतरती हैं...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
12

“सांझ-सवेरे”

(This image has been taken from google)सांझ-सवेरे आजकल मनपुरानी यादों में डूबता है ।खाली कोना छत का औरघण्टाघर की घड़ी के तीर ।क्षितिज पर बिखरी लाली मेंडूबते दिनकर को ढूंढता है ।बेख्याली में आजकल‎ मनपुरानी यादों मे...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
18

"वो दिन"

                     जाड़ों  की ठिठुरन औरतुम्हारे हाथों बने पंराठेजायका आज भी वैसा‎ ही मुँह में घुला है ।बर्फ से ठण्डे हाथ औरसुन्न पड़ती अंगुलियाँजोर से रगड़ कर गर्म‎ करने का हुनर ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
13

“त्रिवेणियाँ”

(This image has been taken from google)  ( 1 )उगते सूरज से मांगा है उन्नति और विकासचाँद से स्निग्धता और उज्जवलता । क्या बताऊँ तुम्हें…..,कि तुमसे कितना प्यार है ।।  ( 2 )लम्बी  डगर और उसके दो छोरबिना मिले अनवरत साथ  ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
15

“गज़ल” ( 2 )

गज़ल सुनने‎ मे पढ़ने में बड़ी भली लगती हैं वे चाहे दर्द बयां करें या जिन्दगी  का  फलसफ़ा …, बात कहने का हुनर बड़ा मखमली होता है। गज़ल लिखने का हुनर तो नही है मेरे पास सोचा  क्यों ना एक नज़्म ...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
मंथन
16

"त्रिवेणियाँ"

                        (This image has been taken from google)(1)सरहदें तो अपने वतन की  ही है मगर ना जाने क्योंउत्तर से दक्कन  आने वाली बयार  भली सी लगती है ।बात कुछ भी नही बस तुम्हारी याद आ जाया करती है।।...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
मंथन
20

“महक”

जब सूरज की तपिश तेज होती है और सूखी धरती पर बारिश की पहली बार बूँदें  टकराती है तो मिट्टी‎ के वजूद से उठती गंध मुझे बड़ी भली लगती है। आजकल जमाना फ्रिज में रखी वाटर बॉटल्स वाला है मगर मेरे बचपन ...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
मंथन
14

“एक ख़त”

This image has been taken from googleएक दिन पुरानी‎ फाइलों मेंकुछ ढूंढते ढूंढते अंगुलि‎यों से तुम्हारा‎ख़त  टकरा गयाकोरे  पन्ने पर बिखरे चन्द  अल्फाज़…, जिनमेंअपने अपनेपन की यादेंपूरी शिद्दत के साथ मौजूद थ...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
मंथन
24

“विभावरी” (हाइकु)

जिद्दी है मनकरता मनमानीकैसी नादानीस्वप्निल आँखें‎ये जागे जग सोयेमौन यामिनीराह निहारेओ भटकी निन्दियाथके से नैनासोया वो चन्दागुप चुप से तारेसोती रजनीभोर का तारादूर क्षितिज परऊषा की लाली ...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
मंथन
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