मंथन की पोस्ट्स

"वो"(3)

(भाग तृतीय)मौहले भर में प्रसिद्ध था कि बरजी काकी चूंकि बचपन में ही ससुराल आ गई  और घर में सबकी दुलारी थी इसलिए स्वभाव में स्त्रीगत गुणों का अभाव व पुरुषोचित गुणों का बाहुल्य था। दिखने में शान...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
मंथन
2

"वो" (2)

  (द्वितीय भाग)आजकल लड़कियों के उत्थान और शिक्षा-दीक्षा के प्रचलन पर बड़ा जोर है ,साक्षरता का प्रतिशत भी उर्ध्वमुखी हो गया है लेकिन चालीस-पचास साल पहले हालात कुछ और ही हुआ करते थे। लड़कियों को शि...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
मंथन
5

"वो"

(प्रथम किश्त)वो हरे ,नीले कपड़ों के थान खुलवाए अपनी दो अंगुलियों की पोरों के बीच घूंघट थामे पारखी नजरों से कपड़े की किस्म भांप रही थी । बड़ी देर बाद उसने हरे रंग का कपड़ा पसन्द किया अब बारी ओढ़नी की थी...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
मंथन
2

"समय"

और एक आज             कल में बीत गया ।और एक सालगत में बदल गया ।जो आज हैउसकी नींव ।जो कल थाउस पर टिकी है ।और जो आएगाउसकी आज पर ।दिन , महिने , सालयूं ही गुजरते हैं ।एक दूसरे से बँधेएक दूसरे के सा...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
मंथन
2

"दुनियादारी"

                   दुनियादारी का गोरखधन्धाअपने आप में अनोखा है ।गाठें पहले भी लगती थीकभी खेल-कूद मेंतो कभी‎ किसी बंटवारे पर ।राग-द्वेष मन के साथआँखों में भी उतर आया करता था ।मगर गिरहे...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
मंथन
3

“शीत ऋतु”

(This image has been taken from google)गीली सी धूप मेंफूलों की पंखुड़ियांअलसायी सीआँखें खोलती हैं ।ओस का मोती भीगुलाब की देह परथरथराता साअस्तित्व तलाश‎ता है ।कोहरे की चादर में लिपटे घर-द्वार औरपगडंडियां भी सहमी ठ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
मंथन
3

"मैं"

                 है तो छोटा सामगर सत्ता‎असीम और अनन्त ।समाया है समूचे संसार में औरगीता के सार में“अहम् ब्रह्मास्मि”सब कुछ ईश्वर‎मयकर्म भी , फल भी ।बड़ा कालजयी हैद्वापर से त्रेतायुग,स...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
मंथन
8

"त्रिवेणी"

                   (1)कुदरत की आँखें‎ नम और मनस्थिति कुछ गमगीन हैएक और  दिवस बीता एक और युग अवसान हुआ ।नश्वरता की प्रकृति  प्रकृति‎ को भी कहाँ भाती है ।।              &n...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
5

"आदत"

उम्र‎ का आवरणमंजिल का फासलातय करते  करते‎थक सा गया हैकदमों की लय भी विराम चाहती हैंआदत है कि…..,आज भी चाँद केसाथ साथ चलती हैंपानी से भरी बाल्टी मेंबादलों की भागती परतेंआज भी वैसे ही उतरती हैं...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
4

“सांझ-सवेरे”

(This image has been taken from google)सांझ-सवेरे आजकल मनपुरानी यादों में डूबता है ।खाली कोना छत का औरघण्टाघर की घड़ी के तीर ।क्षितिज पर बिखरी लाली मेंडूबते दिनकर को ढूंढता है ।बेख्याली में आजकल‎ मनपुरानी यादों मे...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
10

"वो दिन"

                     जाड़ों  की ठिठुरन औरतुम्हारे हाथों बने पंराठेजायका आज भी वैसा‎ ही मुँह में घुला है ।बर्फ से ठण्डे हाथ औरसुन्न पड़ती अंगुलियाँजोर से रगड़ कर गर्म‎ करने का हुनर ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
6

“त्रिवेणियाँ”

(This image has been taken from google)  ( 1 )उगते सूरज से मांगा है उन्नति और विकासचाँद से स्निग्धता और उज्जवलता । क्या बताऊँ तुम्हें…..,कि तुमसे कितना प्यार है ।।  ( 2 )लम्बी  डगर और उसके दो छोरबिना मिले अनवरत साथ  ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
मंथन
6

“गज़ल” ( 2 )

गज़ल सुनने‎ मे पढ़ने में बड़ी भली लगती हैं वे चाहे दर्द बयां करें या जिन्दगी  का  फलसफ़ा …, बात कहने का हुनर बड़ा मखमली होता है। गज़ल लिखने का हुनर तो नही है मेरे पास सोचा  क्यों ना एक नज़्म ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
7

"त्रिवेणियाँ"

                        (This image has been taken from google)(1)सरहदें तो अपने वतन की  ही है मगर ना जाने क्योंउत्तर से दक्कन  आने वाली बयार  भली सी लगती है ।बात कुछ भी नही बस तुम्हारी याद आ जाया करती है।।...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
10

“महक”

जब सूरज की तपिश तेज होती है और सूखी धरती पर बारिश की पहली बार बूँदें  टकराती है तो मिट्टी‎ के वजूद से उठती गंध मुझे बड़ी भली लगती है। आजकल जमाना फ्रिज में रखी वाटर बॉटल्स वाला है मगर मेरे बचपन ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
6

“एक ख़त”

This image has been taken from googleएक दिन पुरानी‎ फाइलों मेंकुछ ढूंढते ढूंढते अंगुलि‎यों से तुम्हारा‎ख़त  टकरा गयाकोरे  पन्ने पर बिखरे चन्द  अल्फाज़…, जिनमेंअपने अपनेपन की यादेंपूरी शिद्दत के साथ मौजूद थ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
15

“विभावरी” (हाइकु)

जिद्दी है मनकरता मनमानीकैसी नादानीस्वप्निल आँखें‎ये जागे जग सोयेमौन यामिनीराह निहारेओ भटकी निन्दियाथके से नैनासोया वो चन्दागुप चुप से तारेसोती रजनीभोर का तारादूर क्षितिज परऊषा की लाली ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
मंथन
15

आँसू

आँसू प्यार और दर्द के‎अहसास की पहचान‎ होते हैंदिल के दर्द को बयान करते हैंठेस लगे तो उमड़ पड़ते हैं तो कभी‎अपनों की जुदाई में भी छलक जाते हैंवक्त बदला और दुनिया बदलीअहसासों की परिभाषा बदलीअब...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
9

“ हम्पी के पुरातात्विक अवशेष”

“आगे चले बहुरि रघुराया ।ऋष्यमूक पर्वत‎ नियराया।।श्री राम की सुग्रीव मैत्री का साक्षी -  ऋष्यमूक पर्वत‎, हनुमान जी जन्मस्थली- आंजनेय पर्वत‎ और बाली पर्वत‎ से घिरा मनोरम स्थल जिसे रामायण का...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
12

“पीड़ा”

मन की पीड़ा बह जाने दो  ।बहते दरिया में वोहल्की हो जाएगी ।गीली लकड़ी‎ समान होती है  मन की पीड़ा ।जब उठती है तोसुलगती सी लगती है  ।और आँखों में धुएँ के साथसांसों में जलन सी भरती है ।पता है ……....  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
9

“त्रिवेणियाँ-4”

                  (1)पछुआ पुरूवाई संग सौंधी सी महक हैकहीं  पहली बारिश  की बूँद गिरी होगी ।माँ के हाथ की सिकती रोटी  यूं ही महका करती थी ।।                   (2) ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
9

“त्रिवेणियाँ”

(This image has been taken from google)( 1 )प्रकृति में रूक्षता और कठोरता दिखती है ओस कण तो मृदुल और तरल होते हैं ।लगता है कभी‎ अपनापा बड़ा गहरा रहा होगा ।।( 2 ) ताल के सोये पानी को कंकड़ी मारशरारती बच्चे ने गहरी नीन्द से ज...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
16

“जड़ें”

(This image has been taken from google)बे वजह ना जाने क्यों …….,आजकल मन बड़ा भटकता है ।जो हो रहा है  वह भाता नहीऔर जो नही है उसके कोई मायने नही ।जड़ें चाहे पेड़ की हो या इन्सान की कटे तो तकलीफ ही होती है ।और हो भी ना क्यो...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
मंथन
14

“वादा”

एक वादा था तुमसेजो खेल खेल में कर दिया जमीं पे तारे और पूनम के चाँद का ।काम जरा मुश्किल सा थामगर बात जिद्द की भी थी ।गुलमोहर के नीचेस्याह रात में बड़े जतन सेमुट्ठी भर जुगनू लाकर छोड़े हैं ।तारों ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
12

“अक्सर”

जब भी सूरज चन्द दिनों की खतिरबादलों की रजाई ओढ़ जबएकान्तवास में चला जाता है तोप्रकृति गमगीन सी हो जाती हैतब एक हूक सी उठती‎ है सीने मेऔर रगों में लहू के साथतुम्हारे साथ जीये खट्टे-मीठेअनुभूत ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
12

“त्रिवेणी”

   (1)मखमली आवरण के स्पर्श‎ का अहसाससदा मुलायमियत भरा नही होता ।कभी कभी‎ उसमें  भी फांस की सी चुभन होती है ।।                  ( 2)रोज रोज यूं जाया ना करोखालीपन अच...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
11

“त्रिवेणी”

कोशिश की है कुछ नया करने की ।  कभी पढ़ी थी गुलजार साहब की लिखी‎  त्रिवेणियाँ ….,लगा बात कहने का हुनर शायद ही जुट पाए  लेकिन मन तो मन ठहरा उसने  चाहा प्रयास करना  चाहिए ।             &nbs...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
13

"रक्षक"

हमारी मातृभूमि के रक्षक वीर जवानों को स्वतन्त्रता दिवस पर समर्पित एक छोटी सी रचना –हिम किरीट के रक्षक तुम,तुझ में शक्ति अपारतुम से रक्षित गौरव राष्ट्र का, तुझे वन्दन बारम्बारहे मातृभूमि रक्...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
12

“महारास”

तारों की उजली छाँह तलेजब आसमान के आंगन में ,चन्दा और चान्दनीमुदित भाव से मिलते हैं ।और धरती के इस आंगन मेंपुरुवाईयों  के झोको  से,बेला , चम्पा , गुलाब संगरजनीगंधा महकते हैं ।।तब वृन्दावन में...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
10

"चाँद"

क्षितिज  पर उठता  पूर्णिमा का चाँद ,रजत के थाल सा।आसमान के आँगन में उतरता,सिन्दूरी ज्वाल सा ।व्योम-धरा का प्रेम प्रतीक,‎किसी तरूणी के बाल गोपाल‎ सा ।  तमाल तरूवर की शाख पे अटकाप्रकृति के अ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
मंथन
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