"एकलव्य" की पोस्ट्स

प्रकृति-'प्रीत'

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   निशाकलश छल-छल छलके जब बन चकोर तू गाता है।  चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........    भोर जा रही परदेस पिया रथ-रश्...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
"एकलव्य"
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चलचित्र !

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     थी धवल केश-सी चिरपरिचित बन भूत-सी मिटती स्याही की बनकर आई है,साँझ वही कुछ ख़्वाब नवल थे..........   आँखों म...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
"एकलव्य"
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काहे बोला !

साहित्य ही है 'धर्म' !जब उसने कहा था तंज की गहराइयों में जा फँसा था। लेखनी चम-चम बनी थीप्रगति द्योत्तक !जा रे ! जा ! बहरूपिये झुठला रहा था। बुद्धिजीवी साहित्य के थे वे पुलिंदे,कोने-कोने ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
"एकलव्य"
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अप्रगतिवादी सोच का मानव !

लालसा उस बौंर की अमिया की डाली पर पल्लवित-पुष्पित होती। नाहक था इंतजार छोटी-छोटी अमिया !लू चलतीहवाओं के थपेड़े में नंग-धडंग, पेड़ की छाँव में बैठे हम। गमछे की पोटली से निकालता 'रमुआ'न...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
"एकलव्य"
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"मन श्याम रंग"'भजन'

मन श्याम रंग विचार में तज, भूलत है सबको  अभी कुछ नींद में सपनें सजत ,चित्त रोअत है अभीभूत बन। धरे हाँथ सुंदर बाँसुरी ,कसे केश अपने मयूर पंख जग कहत जिनको त्रिकालदर्शन,हो प्रतीत ह्रदय निकट...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
"एकलव्य"
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बाज़ारू हूँ ! कहके....

                                                   बाज़ारू हूँ ! कहके.... बंध के बजती पैरों में मैं चाहे सुबह हो शाम ले आती मैं,प्यार के बादल हो कोई खासो-आम। कभी नायिका ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
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ख़त्म करो !

                             ख़त्म करो !हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। दिल्ली की उन सड़कों पर अपना कलुषित मन बेचा है। हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... गुड़-गुड़ करते इस उदरपूर्ति को,ठिठ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
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चार पाए

घर के कोने में बैठा-बैठा फूँक रहा हूँ,उस अधजली सिगरेट को। कुछ वक़्त हो चला है,फूँकते-फूँकतेधूम्र-अग्नि से बना क्षणिक मिश्रण वह। डगमगा रहे हैं पाए कुर्सी के बैठा हूँ जिसपर,कारण वाज़िब ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
"एकलव्य"
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स्वप्न में लिखता गया कुछ पंक्तियाँ !

क्या करूँगा ! ये ज़माना रुख़्सत करेगा चस्पा करेगा गालियाँ मुझपर हज़ारों। कुछ कह सुनायेंगे, तू बड़ा ज़ालिम था पगले !कुछ होके पागल याद में,नाचा करेंगे। ⬌मैं जा रहा हूँ ज़िंदगी तूँ लौट आ !गा रहा ह...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
"एकलव्य"
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मच्छर बहुत हैं !

मच्छर बहुत हैं,आजकल गलियों में मेरे। बात कुछ और है उनकी गली की !लिक्विडेटर लगाकर सोते हैं वे भेजने को गलियों में मेरे क्योंकि !संवेदनाएं न शेष हैं ,अब मानवता की। पानी ही पानी रह गया...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
"एकलव्य"
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मैं हूँ अधर्मी !

 मैं हूँ अधर्मी ! तैरती हैं झील में वे ख़्वाब जो धूमिल हुए। कुछ हुए थे रक्तरंजित सड़कों पर बिखरे पड़े। चाहता धारण करूँ शस्त्र जो हिंसा लिए याद आते हैं, वे बापू स्नेह जो मन में भरें।&...  और पढ़ें
9 माह पूर्व
"एकलव्य"
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जीवित स्वप्न !

 जीवित स्वप्न !चाँद के भी पार होंगे घर कई !देखता हूँ रात में मंज़र कई चाँदी के दरवाज़े बुलायेंगे मुझे ओ मुसाफ़िर ! देख ले हलचल नई वायु के झोंकों से खुलेंगी खिड़कियाँ जो स्वर्ण की !प...  और पढ़ें
9 माह पूर्व
"एकलव्य"
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"फिर वह तोड़ती पत्थर"

"फिर वह तोड़ती पत्थर"वह तोड़ती पत्थरआज फिर से खोजता हूँ'इलाहाबाद'के पथ परदृष्टि परिवर्तित हुईकेवल देखने मेंदर्द बयाँ करतेहाथों पर पड़े छालेफटी साड़ी में लिपटीअस्मिता छुपातीछेनी -हथौड़ी लिएवही ह...  और पढ़ें
10 माह पूर्व
"एकलव्य"
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''अविराम लेखनी''

''अविराम लेखनी'' लिखता जा रे !तूँ है लेखक रिकार्ड तोड़ रचनाओं की गलत वही है तूँ जो सही है घोंट गला !आलोचनाओं की पुष्प प्रदत्त कर दे रे ! उनको दिन में जो कई बार लिखें लात मार दे ! कसकर उ...  और पढ़ें
10 माह पूर्व
"एकलव्य"
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'शोषित'

'शोषित' ओ बापू ! बड़ी प्यास लगी है पेट में पहले आग लगी है थोड़ा पानी पी लूँ क्या !क्षणभर जीवन जी लूँ क्या !धैर्य रखो ! थोड़ा पीयूँगा संभल-संभल भर हाथ धरूँगा दे दो आज्ञा रे ! रे ! बापू सौ किरिया, ...  और पढ़ें
11 माह पूर्व
"एकलव्य"
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"पुनरावृत्ति"

"पुनरावृत्ति" 'सोज़े वतन'अब बताने हम चले 'लेखनी'का मूल क्या ?तुझको जताने हम चले !'सोज़े वतन', अब बताने हम चले ..... भौंकती है भूख नंगी मरने लगे फुटपाथ पर नाचती निर्वस्त्र 'द्रौपदी' पांडवों क...  और पढ़ें
11 माह पूर्व
"एकलव्य"
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''अवशेष''

''अवशेष'' सम्भालो नित् नये आवेग रखकर रक़्त में 'संवेग' सम्मुख देखकर 'पर्वत' बदल ना ! बाँवरे फ़ितरत अभी तो दूर है जाना तुझे है लक्ष्य को पाना उड़ा दे धूल ओ ! पगले क़िस्मत है छिपी तेरी गिरा...  और पढ़ें
11 माह पूर्व
"एकलव्य"
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''सती की तरह''

"सती की तरह" मैं आज भी हूँ सज रही सती की तरह ही मूक सी मुख हैं बंधे मेरे समाज की वर्जनाओं से खंडित कर रहें तर्क मेरे वैज्ञानिकी सोच रखने वाले अद्यतन सत्य ! भूत की वे ज्योत रखने ...  और पढ़ें
12 माह पूर्व
"एकलव्य"
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"और वे जी उठे" !

"और वे जी उठे" !मैं'निराला'नहीं प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ 'दुष्यंत'की लेखनी का गुरूर ज़रूर हूँ 'मुंशी'जी गायेंगे मेरे शब्दों में कुछ दर्द सुनायेंगे सवा शेर गेहूँ के एक बार मरूँगा पुनः सा...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
25

''वही पेड़ बिना पत्तों के''

''वही पेड़ बिना पत्तों के''वही पेड़बिना पत्तों के झुरमुट सेझाँकता मन को मेरे भाँपताकल नहीं सोया था एक निद्रा शीतल भरी उनके स्मरणों को संजोता हुआशुष्क हो चलें हैं जीवन के विचार प...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
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''बेग़ैरत''

उस मील के पत्थर को सोचता चला जाता हूँ इस उम्र की दहलीज़ पर आकर फ़िसल जाता हूँ बस लिखता चला जाता हूँ ..... बस्ती हुई थी रौशन जब गुज़रे थे, इन गलियों से होकर कितना बेग़ैरत था, मैं अपनी ही खुद...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
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"कहीं मेरे कफ़न की चमक"

कुछ जलाये गए ,कुछ बुझाये गएकुछ काटे गए ,कुछ दफ़नाये गएमुझको मुक़्क़म्मल जमीं न मिलीमेरे अधूरे से नाम मिटाए गए एक वक़्त था ! मेरा नाम शुमार हुआ करता था चंद घड़ी के लिये ही सही ,  ख़ास -ओ -आम हुआ करता थ...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
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"ख़ाली माटी की जमीं"

बदलते समाज में रिश्तों का मूल्य गिरता चला जा रहा है। बूढ़े माता-पिता बच्चों को बोझ  प्रतीत होने लगे हैं और हो भी क्यूँ न ? उनके किसी काम के जो नहीं रह गए ! हास् होती सम्बन्धों में संवेदनाये...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
25

"मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा"

अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़राहवाओं को लपेट  के  तू ,  आंधियाँ बना -बनालहू की  गर्मियों से तूं , मशाल तो जला -जलाजला दे ग़म के शामियां ,नई सुबह तो ला ज़रा                   ...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
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''पथ के रज''

गा रहीं हैं,सूनी सड़कें ओ ! पथिक तूँ लौट आ भ्रम में क्यूँ ? सपनें है बुनता नींद से ख़ुद को जगा प्रतिक्षण प्रशंसा स्वयं लूटे मिथ्या ही राजा बना चरणों की , तूँ धूल है  सत्य विस्मृत कर च...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
25

"न्याय की वेदी"

मैं प्रश्न पूछता अक़्सर !न्याय की वेदी पर चढ़कर !लज्ज़ा तनिक न तुझको हाथ रखे है !सिर पर मैं रंज सदैव ही करता,मानुष ! स्वयं हूँ,कहकर ! लाशों के ढेर पे बैठा बन ! निर्लज्ज़ तूँ ,मरघट स...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
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"कालनिर्माता"

स्वीकार करता हूँ मानव संरचना कोशिका रूपी एक सूक्ष्म इकाई मात्र से निर्मित हुई है और यह भी स्वीकार्य है जिसपर मुख्य अधिकार हमारे विक्राल शरीर का है किन्तु यह भी सारभौमिक सत्य है कोशिका रूपी य...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
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"प्राणदायिनी"

वो दूध पिलाती माता !वो गले लगाती माता !कोमल चक्षु में अश्रु लेकर तुझे बुलाती माता !वो जग दिखलाती माता !तुझको बहलाती माता !तेरे सिर को हृदय लगाये ब्रह्माण्ड समेटे गाथा !रोती सड़...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
"एकलव्य"
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''विजय पताका''

वे शहद चटातें हैं !तुमको मैं नमक लगाता हूँ !तुमको वे स्वप्न दिखाते हैं !तुमको मैं झलक दिखाता हूँ !तुमको वे रंग लगातें हैं !तुमको मैं रक्त दिखाता हूँ !तुमको गर्दन पर चाकू मल...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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