पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

डोल गया मन

फिर क्या था, डोल गया, कुछ बोल गया ये मन.....उफक परसर रखकर इठलाई रवि किरण,झील में तैरते फाहों पर, आई रख कर चरण,आह, उस सौन्दर्य का क्या करुँ वर्णनपल भर कोमूँद गए मेरे मुग्ध नयन....फिर क्या था, डोल ग...  और पढ़ें
7 घंटे पूर्व
कविता "जीवन कलश"
0

बर्फ के फाहे

कुछ फाहे बर्फ की, जमीं पर संसृति की गिरीं.....व्यथित थी धरा, थी थोड़ी सी थकी,चिलचिलाती धूप में, थोड़ी सी थी तपी,देख ऐसी दुर्दशा, सर्द हवा चल पड़ी,वेदनाओं से कराहती, उर्वर सी ये जमी,सनैः सनैः बर्फ के फाहो...  और पढ़ें
17 घंटे पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

हाँ मनुष्य हूँ

तुझे कितनी बार बताऊँ, हाँ मैं ही मनुष्य हूँ.....!मैं सर्वाहारी, स्तनपयी, होमो सेपियन्स हूँ!निएंडरथल नहीं, क्रोमैगनाॅन मानव हूँ,अमूर्त्त सोचने, ऊर्ध्व चलने, बातों में सक्षम हूँ,तात्विक प्रवीणताए...  और पढ़ें
2 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

वही धुन

धुन सरगम की वही, चुन लाना फिर से तू यारा......वो पहला कदम, वो छम छम छम,इस दहलीज पर, रखे थे जब तूने कदम,इक संगीत थी गूंजी, गूंजा था आंगन,छम छम नृत्य कर उठा था ये मृत सा मन,वही प्रीत, वही स्पंदन, दे देना मुझक...  और पढ़ें
2 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

खिलते पलाश

काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश...चाहे पुकारता किसी नाम से, रखता नैनों मे इसे हरपल,परसा, टेसू, किंशुक, केसू, पलाश,या प्यार से कहता दरख्तेपल....दिन बेरंग ये रंगते टेसूओं से,फागुन सी होती ये पवन,होली ...  और पढ़ें
4 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

कूक जरा पी कहाँ

ऐ री प्यारी पपीहा,तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..!छिपती छुपाती क्युँ फिरती तू,कदाचित रहती नजरों से ओझल तू,तू रिझा बसंत को जरा,ऊँची अमुआ की डाली पर बैठी है तू कहाँ?ऐ री प्यारी पपीहा,तू कूक जर...  और पढ़ें
5 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

आज क्युँ?

आज क्युँ ?कुछ बिखरा-बिखरा सा लगता है,मन के अन्दर ही, कुछ उजड़ा-उजड़ा सा लगता है,बाहर चल रही, कुछ सनसन करती सर्द हवाएँ,मन के मौसम में,कुछ गर्म हवा सा शायद बहता है.......आज क्युँ ?कुछ खुद को समेट नहीं पाता ह...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

युग का जुआ

जतन से युग का जुआ, बस थामकर होगा उठाना....खींचकर प्रत्यंचा,यूँ धीर कर,साध लेना वो निशाना.....गर सिर्फ गर....!बिंब उस लक्ष्य की,इन आँखों में रची बसी,लगन की साध से,गर ये प्रत्यंचा रही कसी,धैर्य का दामन,छो...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

आत्मकथा

खुद को समझ महान, लिख दी मैने आत्मकथा!इस तथ्य से था मैं बिल्कुल अंजान,कि है सबकी अपनी व्यथा,हैं सबके अनुभव, अपनी ही इक राम कथा,कौन पढे अब मेरी आत्मकथा?अंजाना था मैं लेकिन, लिख दी मैने आत्मकथा!हश्र ...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

बदल रहा ये साल

युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल...यादों के कितने ही लम्हे देकर,अनुभव के कितने ही किस्से कहकर,पल कितने ही अवसर के देकर,थोड़ी सी मेरी तरुणाई लेकर,कांधे जिम्मेदारी रखकर, बदल रहा ये साल...प्रगति क...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

मुख़्तसर सी कोई बात

मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात....सांझ की किरण, रोज ही छू लेती है मुझे,देखती है झांक कर, उन परदों की सिलवटों से,इशारों से यूँ ही, खींच लाती है बाहर मुझे,सुरमई सी सांझ, ढ़ल जाती है फिर आँखों म...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

बदला सा अक्श

इस दफा आईने में, बदला सा था अक्श मेरा....न जाने वो कौन सा, जादू था भला,न जाने किस राह, मन ये मेरा था चला,कुछ सुकून ऐसा, मेरे मन को था मिला,आँखों मे चमक, नूर सा चेहरा खिला।आईना था वही, बस बदला सा था अक्श म...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

माँ, बेटा और प्रश्न

माँ से फिर पूछता नन्हा "क्या हुआ फिर उसके बाद?"निरुत्तर माता, कुछ पल को चुप होती,मुस्कुराकुर फिर, नन्हे को गोद में भर लेती,चूमती, सहलाती, बातों से बहलाती,माँ से फिर पूछता नन्हा "क्या हुआ फिर उसके ब...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

750वीं रचना

स्व-अनुभवों की विवेचना है मेरी 750वीं रचना,रचनाओं की भीड़ में लिख रहा हूँ एक और रचना....नाम मात्र की नहीं ये रचना,पंख ले उड़ान भरती हुई है ये कोई संकल्पना,जन्म ले रही होती कोई कल्पना,स्व-अनुभवों की ह...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

रेत सा लम्हा

वक्त की झोली में, अनंत लम्हे हैं भरे,जीते जागते से, बिल्कुल हरे भरे...क्युँ न मांग लूं, वक्त से मैं भी एक लम्हा,चुपचाप क्युँ रहूँ मैं यहाँ तन्हा.....?होगा कोई तो लम्हा, मेरे भी नाम का,भीड़-भाड़ में, हो जो ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

आइए आ जाइए

आइए आ जाइए, थोड़ा और करीब आ जाइए......हँसिए-हँसाइए, रूठीए मनाइए,गाँठ सब खोलकर, जरा सा मुस्कुराइए,गुदगुदाइए जरा खुद को भूल जाइए,भरसक यूँ ही कभी, मन को भी सहलाइए,जीने के ये चंद बहाने सीख जाइए......आइए आ जाइ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

उन पहाड़ों को

उन पहाड़ों में कहीं, खुद को छोड़ आया था मैं....विशाल होकर भी कितनी शालीन,उम्रदराज होकर भी नित नवीन,एकांत में रहकर भी कितनी हसीन,मुखर मौन, भाव निरापद और संज्ञाहीन....उन पहाड़ों में कहीं, खुद को छोड़ आया थ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

ऋतुराज शिशिर

फिजाओं ने फिर, ओस की चादर है फैलाई,संसृति के कण-कण पर, नव-वधु सी है तरुणाई,जित देखो तित डाली, नव-कोपल चटक आई,ऋतुराज के स्वागत की, वृहद हुई तैयारी.....नव-वधु सी नव-श्रृंगार, कर रही ये वसुंधरा,जीर्ण काया ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

किसकी राह तके

सदियाँ बीत गई, प्रीत वो रीत गई...........बैरन ये प्रीत हुई,डोली प्रीत की, बस यादों में सजती रही,भूल चुके वो तुझको,तू किसको याद करे, किसकी राह तके?बैरी हुई ये पवन,मुई, अब छूकर गुजरती है क्युँ मेरा बदन,न वो ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

न आना अब

वो कौन है जो दस्तक, देकर गया मेरे दर तक?शायद अजनबी कोई!या शख्स पहचाना सा कोई?बिसारी हुई बातें कोई!या यादों की इक कहानी कोई!वो कौन है जो लौटा, दस्तक देकर मेरे घर तक?बेचैन कर गया कोई!नींदे मेरी लेकर ग...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

क्यूँ झाँकूं मैं बाहर

क्यूँ झाँकूं मैं मन के बाहर.....जब इतना कुछ घटित होता है मन के ही भीतर,सब कुछ अलिखित होता है अन्दर ही अन्दर,कितने ही विषयवस्तु, कौन चुने आकर?बिन लघुविराम, बिन पूर्णविराम...बिन मात्रा, शब्दों बिन प्र...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

बोझिल रात

यूँ बड़ी देर तक, कल ठहर गई थी ये रात,भावुक था थोड़ा मैं, कुछ बहके थे जज्बात,शायद कह डाली थी मैने, अपने मन की बात,खैर-खबर लेने को, फिर आ पहुँची ये रात!याद मुझे फिर आई, संत रहीम की ये बात..."रहिमन निजमन की व्...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

रात और तुम

धीरे! उफ़, कितनी धीरे-धीरे ढलती है यह रात...अपारदर्शी परत सी ये घनेरी रात,विलीन है जिसमें रूप, शक्ल और पते की सब बात,पिघली सी इसमें सारी प्रतिमा, मूर्त्तियाँ,धूमिल सी है ओट और पत्तियाँ,बस है एक स्व...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

वापी

ले चल तू मुझको उस वापी ऐ नाविक,हो आब जहाँ मेरे मनमाफिक।अंतःसलिल हो जहाँ के तट,सूखी न हो रेत जहाँ की,गहरी सी हो वो वापी, हो मीठी सी आब जहाँ की।दीड घुमाऊँ मैं जिस भी ओर,हो चहुँदिश नीवड़ जीवन का शोर,मन ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

रूबरू

रूबरू मिल गए, गर वो किसी मोड़ पर तो!तुम लौट आओ यही हम कहेंगे,हैं कितनी बातें अधूरी, मुलाकातें जरूरी,टूटे ख्वाबों को फिर से हम जोड़ लेंगे,रख लेंगे, सहेज कर वो यादों के पल हम,उसी मोड़ से उनको घर ले चलेंग...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

मेरे पल

वो कुछ पल जो थे बस मेरे......युँ ही उलझ पड़े मुझसे कल सवेरे-सवेरे,वर्षों ये चुप थे या अंतर्मुखी थे?संग मेरे खुश थे या मुझ से ही दुखी थे?सदा मेरे ही होकर क्युँ मुझ से लड़े थे?सवालों में थे ये अब मुझको ही घ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

जलता दिल

राख! सभी हो जाते हैं जलकर यहाँ,दिल ये है कि जला...और उठा न कहीं भी धुँआ!है जलने में क्या?बैरी जग हुआ दिल जला!चित्त चिढा,मन को छला,दिल जला!कहीं आग न कहीं दिया, दिल यूँ ही बस जला!ये धुआँ?दिल में ही घुटता ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

स्नेह वृक्ष

बरस बीते, बीते अनगिनत पल कितने ही तेरे संग,सदियाँ बीती, मौसम बदले........अनदेखा सा कुछ अनवरत पाया है तुमसे,हाँ ! ... हाँ! वो स्नेह ही है.....बदला नही वो आज भी, बस बदला है स्नेह का रंग।कभी चेहरे की शिकन से झलक...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

हमसफर

इस राह की सफर के ऐ मेरे हमसफर,ना खत्म हो ना कभी, ये सफर यूँ ही उम्र भर।राह में गर काँटे तुमको मिले अगर,शूल पथ में हो हजार, बिछे हों राह में पत्थर,तुम राहों में चलना दामन मेरा थामकर,खिल आएंगे काँटों ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

हार-जीत

बयाँ कर गई मेरी बेबसी, उनसे मेरे आँखो की ये नमी!नीर उनकी नैनों में, शब्द उनके होठों पे,क्युँ लग रहे हैं बरबस रुके हुए?शायद पढ़ लिया हैं उसने कहीं मेरा मन!या मेरी आँखे बयाँ कर गई है बेबसी मेरे मन की!...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4
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