पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

रक्तधार

अविरल बहती ये धारा, हैं इनकी पीड़ा के आँसू,अभिलाषा मन में है बोझिल, रक्तधार से बहते ये आँसू.....चीरकर पर्वत का सीना, लांघकर बाधाओं को,मन में कितने ही अनुराग लिए ये धरती पर आई,सतत प्रयत्न कर भी पाप धर...  और पढ़ें
3 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

खिलौना

तूने खेल लिया बहुत इस तन से,अब इस तन से तुझको क्या लेना और क्या देना?माटी सा ये तन ढलता जाए क्षण-क्षण,माटी से निर्मित है यह इक क्षणभंगूर खिलौना।बहलाया मन को तूने इस तन से,जीर्ण खिलौने से अब, क्या ...  और पढ़ें
4 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

परखा हुआ सत्य

फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता?सूर्य की मानिंद सतत जला है वो सत्य,किसी हिमशिला की मानिंद सतत गला है वो सत्य,आकाश की मानिंद सतत चुप रहा है वो सत्य!अबोले बोलों में सतत कुछ कह रहा ह...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

ख्वाब जरा सा

कभी चुपके से बिन बोले तुम आना,इक मूक कहानी सहज डगों से तुम लिख जाना,वो राह जो आती है मेरे घर तक,उन राहों पर तुम छाप पगों की नित छोड़ जाना,उस पथ के रज कण, मैं आँखों से चुन लूंगा,तेरी पग से की होंगी जों ...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

अतृप्ति

अतृप्त से हैं कुछ,व्याकुल पल, और है अतृप्त सा स्वप्न!अतृप्त है अमिट यादों सी वो इक झलक,समय के ढ़ेर पर......सजीव से हो उठे अतृप्त ठहरे वो क्षण,अतृप्त सी इक जिजीविषा, विघटित सा होता ये मन!अनगिनत मथु के ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

हलचल व सम्मान

http://halchalwith5links.blogspot.in/2017/06/695.html?m=1&_utm_source=1-2-2*पाँच लिंकों का आनन्द*दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...*रविवार, 11 जून 2017**695.......  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

कुछ और दूरियाँ

अंततः चले जाना है हमें, इस जहाँ से कहीं दूर,शाश्वत सत्य व नि:शब्द चिरशांति के पार,उजालों से परिपूर्ण होगी वो अन्जानी सी जगह,चाह की चादर लपेटे धूलनिर्मित इस देह को बस,चलते हुए कुछ और दूरियाँ करनी...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

प्रेम के कल्पवृक्ष

ऐ नैसर्गिक प्रेम के मृदुल एहसास,फैल जाओ तुम फिर इन धमनियों में रक्त की तरह,फिर लेकर आओ वही मधुमास,के देखूँ जिधर भी मैं दिशाओं में मुड़कर,वात्सल्य हो, सहिष्णुता हो, हर आँखों मे हो विश्वास,लोभ, द्व...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

कोरी सी कल्पना

शायद है ये इक दिवास्वप्न या महज कोरी सी कल्पना!कविताओं में मैने जिसको हरपल विस्तार दिया,मन की भावों से इक रूप साकार किया,हृदय की तारों से मैने जिसको स्वीकार किया,अभिलाषा इक अपूर्ण सा मैने अंगी...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
9

मदान्ध

होकर मदान्ध सौंदर्य में, तू क्यों इतना इतराए रे....ऐ पुष्प तू है कोमल, तू है इतनी स्निग्ध,गिरी टूटकर जो शाखाओ से, है तेरा बचना संदिग्ध,हो विकसित नव प्रभात में, संध्या तू कुम्हलाए रे,चटकीली रंगों प...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

यादों के परदेश से

जब शाम ढली, इक नर्म सी हवा चली,अभिलाषा की इक नन्ही कली फिर से मन मे खिली,जाने कैसे मन यादों में बहक गया,सिसकी भरते अन्तर्मन का अंतर्घट तक रीत गया,तेरी यादों का ये मौसम, तन्हा ही बीत गया....तब जेठ हुई,...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

भूल चुका था मैं

भूल सा चुका था मैं, न गया था मैं मुड़कर उन्हे देखने...किताबों में दबी उन सूखी सी पत्तियों को...वर्जनाओं की झूठी सी परत में दबी उन बंदिशों को,समय की धूल खा चुकी मृत ख्वाहिशों को,क्षण भर को मन में हूक उ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

पिता की नजर से इक माँ

इक झलक पिता की नजर से पत्नी में समाई "माँ"......कहता है ये मन, स्नेहिल सी माँ है वो बस इक प्रेयसी नहीं,है इक कोरी सी कल्पना, या है वो इक ममता की छाँव..वो खूबसूरत से दो हाथ, वो कोमल से दो पाँव,वो ऊँगलियों प...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

कोणार्क

लो मैं चली कोणार्क, हूँ मैं अपने साजन की दुल्हन....ओ री बहकती चिलचिलाती लहकती सी किरण,है ये कोणार्क, न बढा अपनी ये तपिश अपनी ये जलन,कर दे जरा छाँव, मिटे तन की ये दहकती सी तपन,ओ री सुलगती तपतपाती दहकत...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

इक खलिश

पलकें अधखुली,छू गई सूरज की किरण पहली,अनमने ढंग से फिर नींद खुली।।।मन के सूने से प्रांगण में दूर तलक न था कोई,इक तुम्हारी याद! निंदाई पलकें झुकाए,सामने बैठी मिली...!मैं करता रहा,उसे अपनाने की कोशि...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

मोहब्बत

शब्दों की शक्ल में ढलती रही, इक तस्वीर सी वो!युँ ही कुछ लिखने लगा था मैं,शब्दों से कुछ भाव मन के बुनने लगा था मैं,दूर खुद से कहीं दूर होने लगा था मैं,फिर याद नहीं, ये क्या लिखने लगा था मै?तस्वीर से न...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

श्वेताक्षर

यह क्या लिख रहा कोई पहाड़ों पर श्वेताक्षरों में?रुखड़े से मेरे मन की पहाड़ी पर,तप्त शिलाओं के मध्य,सूखी सी बंजर जमीन पर,आशाओं के सपने मन में संजोए,धीरे-धीरे पनप रहा,कोमल सा इक श्वेत तृण............क्या स...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
11

अचिन्हित तट

ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट....अनगिनत लहर संवेदनाओं के उमरते तुम पर,सूना है फिर भी क्यूँ तेरा ये तट?सुधि लेने तेरा कोई, आता क्यूँ नहीं तेरे तट?अचिन्हित सा अब तक है क्यूँ तेरा ये निश...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

बस मिले थे

बस मिले थे मुलाकात के वो, अनगिनत से सैकड़ों पल..चंद बिसरी सी बातें, चंद भूले से वादे,बेवजह की मुफलिसी, बेबात की मनमानियाँ,बे इरादा नैनों की वो नादान सी शैतानियाँ,पर कहाँ बदल सके वो, हालात के चंद बि...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

दूरियाँ

क्यूँ रही दिल के बहुत करीब वो सदियों की दूरियाँ?क्या कोई तिलिस्म है येया गहरा है कोई राज ये,या है ये हकीकत,या है ये बस इक तसब्बुर की बात।क्यूँ थम सी गई है धूँध सी चलती हुई ये आँधियाँ?क्यूँ हवाओं म...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी

दिखने में नायाब! मगर किसी भी क्षण ढहने को बेताब!बेमिसाल, मगर टूटती हुई ख्वाहिशों की जिन्दगी!अकस्मात् ही,रुक से गए जैसे जिन्दगी के रास्ते,मोहलत भी न मिली होख्वाहिशों के परिंदों को ऊड़ने की जैसे!...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

उल्लास

इशारों से वो कौन खींच रहा क्षितिज की ओर मेरा मन!पलक्षिण नृत्य कर रहा आज जीवन,बज उठे नव ताल बज उठा प्राणों का कंपन,थिरक रहे कण-कण थिरक रहा धड़कन,वो कौन बिखेर गया उल्लास इस मन के आंगननयनों से वो कौन...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
9

बेचैन खग

तट के तीरे खग ये प्यासा,प्रीत की नीर का जरा सा,नीर प्रीत का तो मिलता दोनो तट ही!कलकल सा वो बहता, इस तट भी! उस तट भी!पर उभरती कैसी ये प्यास,सिमटती हर क्षण ये आश,यह कैसी है विडम्बना?या शायद है यह इक अमि...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

हमेशा की तरह

हकीकत है ये कोई या है ये दिवास्वप्न, हमेशा की तरह!हमेशा की तरह, है किसी दिवास्वप्न सा उभरता,ख्यालों मे फिर वही, नूर सा इक रुमानी चेहरा,कुछ रंग हल्का, कुछ वो नूर गहरा-गहरा.......हमेशा की तरह, फिर दिखते ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

वक्त के सिमटते दायरे

हैं ये वक्त के सिमटते से दायरे,न जाने ये कहाँ, किस ओर लिए जाए रे?अंजान सा ये मुसाफिर है कोई,फिर भी ईशारों से अपनी ओर बुलाए रे,अजीब सा आकर्षण है आँखो में उसकी,बहके से मेरे कदम उस ओर खीचा जाए रे,भींचक...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

गूंजे है क्युँ शहनाई

क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में?अभ्र पर जब भी कहीं, बजती है कोई शहनाई,सैकड़ों यादों के सैकत, ले आती है मेरी ये तन्हाई,खनक उठते हैं टूटे से ये, जर्जर तार हृदय के,चंद बूंदे मोतियों के,...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

क्षितिज की ओर

भीगी सी भोर की अलसाई सी किरण,पुरवैयों की पंख पर ओस में नहाई सी किरण,चेहरे को छूकर दिलाती है इक एहसास,उठ यार! अब आँखे खोल, जिन्दगी फिर है तेरे साथ!ये तृष्णगी कैसी, फिर है मन के आंगन,ढूंढती है किसे ये...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

भरम वहम

इक भरम सा हुआ मन को,चोरी चोरी चुपके किन्ही बातों से जरा डर गए वो,वहम है ये मेरा या हकीकत है कोई वो!शीतल सी कोई पवन है वो,या चिंगारी सी जलती हुई दहकती अगन है वो,लग रहा जैसे मेरा ही भरम है वो,शायद थोड़ी ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

कुछ कदम और

साँस टूटने से पहले कुछ कदम मैं और चल लूँ,मंजिलों के निशान बुन लूँ,कांटे भरे हैं ये राह सारे,कंटक उन रास्तों के मैं चुन लूँ,बस कुछेक कदम मैं और चल लूँ......आवाज मंजिलों को लगा लूँ,मूक वाणी मैं जरा मुख...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

क्युँ हुई ये सांझ!

आज फिर क्युँ हुई है, ये शाम बोझिल सी दुखदाई?शांत सी बहती वो नदी, सुनसान सा वो किनारा,कहती है ये आ के मिल, किनारों ने है तुझको पुकारा,बहती सी ये पवन, जैसे छूती हो आँचल तुम्हारा,न जाने किस तरफ है,  इस ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3
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