पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

आसक्ति

आसक्त होकर निहारता हूँ मैं वो खुला सा आकाश!अनंत सीमाओं में स्वयं बंधी,अपनी ही अभिलाषाओं में रमी,पल-पल रूप अनंत बदलती,कभी निराशाओं के काले घनघोर घन,सन्नाटों में कभी घन की आहट,वायु सा कभी प्रतिप...  और पढ़ें
2 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
0

चुप सी धड़कन

इस दिल में ही कहीं, इक धड़कन अब चुप सा रहता है!चुप सी अब रहने लगी है, इक शोख सी धड़कन!बेवजह ही ये कभी बेजार सा धड़कता था,भरी भीड़ में अब, तन्हा-तन्हा ये क्यूँ रहता है!अब तन्हाई में न जाने, ये किस से बातें क...  और पढ़ें
5 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

समर्पण

वो पुष्प! संपूर्ण समर्पित होकर भी, शायद था वो कुछ अपूर्ण!अन्त: रमती थी उसमें निष्ठा की पराकाष्ठा,कभी स्वयं ईश के सर चढ कर इठलाता,या कभी गूँथकर धागों में पुष्पगु्च्छ बन इतराता,भीनी सी खुश्बु देक...  और पढ़ें
7 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

कभी

कभी गुजरना तुम भी मन के उस कोने से,विलखता है ये पल-पल, तेरे हो के भी ना होने से...कुछ बीत चुके दिन सा है...तेरा मौजूदगी का अनथक एहसास!हकीकत ही हो तुम इक,मन को लेकिन ये कैसे हो विश्वास?कभी चुपके से आकर म...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

श्रापमुक्त

कुछ बूँदे! ... जाने क्या जादू कर गई थी?लहलहा उठी थी खुशी से फिर वो सूखी सी डाली....झेल रहा था वो तन श्रापित सा जीवन,अंग-अंग टूट कर बिखरे थे सूखी टहनी में ढलकर,तन से अपनों का भी छूटा था ऐतबार,हर तरफ थी टू...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

मन का इक कोना

मन का इक कोना, तुम बिन है आज भी सूना.....यूँ तो अब तन्हा बीत चुकी हैं सदियाँ,बहाने जी लेने के सौ, ढूँढ लिया है इस मन ने,फिर भी, क्युँ नही भरता मन का वो कोना?वो कोना चाहे तेरी ही यादों में खोना?मन का इक को...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

हरी चूड़ियाँ

हाथों में चहकी हरीतिमा, ललचाए ये मन साजन के....हरी सी वो चूड़ियाँ, गाते हैं गीत सावन के,छन-छन करती वो चूड़ियाँ, कहते हैं कुछ हँस-हँस के,नादानी है ये उनकी या है वो गीत शरारत के?हाथों में चहकी हरीतिमा, लल...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

छलकते बूँद

ऋतु सावन की लेकर आई ये घटाएँ,बारिश की छलकी सी बूँदों से मन भरमाए,मंद-मंद चंचल सा वो बदरा मुस्काए!तन बूंदो से सराबोर, मन हो रहा विभोर,छलके है मद बादल से, मन जाए किस ओर,छुन-छुन छंदों संग, हिय ले रहा हि...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

रिमझिम सावन

आँगन है रिमझिम सावन, सपने आँखों में बहते से...बूदों की इन बौछारों में, मेरे सपने है भीगे से,भीगा ये मन का आँगन, हृदय के पथ हैं कुछ गीले से,कोई भीग रहा है मुझ बिन, कहीं पे हौले-हौले से....भीगी सी ये हरीत...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

विरह के पल

सखी री! विरह की इस पल का है कोई छोर नहीं.....आया था जीवन में वो जुगनू सी मुस्कान लिए,निहारती थी मैं उनको, नैनों में श्रृंगार लिए, खोई हैं पलको से नींदें, अब असह्य सा इन्तजार लिए,कलाई की चूरी भी मेरी,...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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उजड़ा हुआ पुल

यूँ तो बिसार ही चुके हो अब तुम मुझे!देख आया हूँ मैं भी वादों के वो उजरे से पुल,जर्जर सी हो चुकी इरादों के तिनके,टूट सी चुकी वो झूलती टहनियों सी शाखें,यूँ ही भूल जाना चाहता है अब मेरा ये मन भी तुझे!प...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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जीवन यज्ञ

इक अनवरत अनुष्ठान सा है यह जीवन का यज्ञ,पर, विधि विधान के फेरों में, है उलझी यह जीवन यज्ञ,कठिन तपस्या......!संपूर्णता की चाह में कठिन तपस्या कर ली मानव ने,पर, मनोयोग पाने से पहले.....पग-पग बाधाएँ कितनी ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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विखंडित मन

विखंडित ऐ मेरे मन! मैं तुझको कैसे समझाऊँ?हैं अपने ही वो जिनसे रूठा है तू,हुआ क्या जो खंड-खंड टूटकर बिखरा है तू,है उनकी ये नादानी जिनके हाथों टूटा है तू,माना कि टूटी है वीणा तेरे अन्तर की,अब मान भी ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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त्यजित

त्यजित हूँ मै इक, भ्रमित हर क्षण रहूँगा इस प्रेमवन में।क्षितिज की रक्तिम लावण्य में,निश्छल स्नेह लिए मन में,दिग्भ्रमित हो प्रेमवन में,हर क्षण जला हूँ मैं अगन में...ज्युँ छाँव की चाह में, भटकता ह...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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रक्तधार

अविरल बहती ये धारा, हैं इनकी पीड़ा के आँसू,अभिलाषा मन में है बोझिल, रक्तधार से बहते ये आँसू.....चीरकर पर्वत का सीना, लांघकर बाधाओं को,मन में कितने ही अनुराग लिए ये धरती पर आई,सतत प्रयत्न कर भी पाप धर...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

खिलौना

तूने खेल लिया बहुत इस तन से,अब इस तन से तुझको क्या लेना और क्या देना?माटी सा ये तन ढलता जाए क्षण-क्षण,माटी से निर्मित है यह इक क्षणभंगूर खिलौना।बहलाया मन को तूने इस तन से,जीर्ण खिलौने से अब, क्या ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
10

परखा हुआ सत्य

फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता?सूर्य की मानिंद सतत जला है वो सत्य,किसी हिमशिला की मानिंद सतत गला है वो सत्य,आकाश की मानिंद सतत चुप रहा है वो सत्य!अबोले बोलों में सतत कुछ कह रहा ह...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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ख्वाब जरा सा

कभी चुपके से बिन बोले तुम आना,इक मूक कहानी सहज डगों से तुम लिख जाना,वो राह जो आती है मेरे घर तक,उन राहों पर तुम छाप पगों की नित छोड़ जाना,उस पथ के रज कण, मैं आँखों से चुन लूंगा,तेरी पग से की होंगी जों ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

अतृप्ति

अतृप्त से हैं कुछ,व्याकुल पल, और है अतृप्त सा स्वप्न!अतृप्त है अमिट यादों सी वो इक झलक,समय के ढ़ेर पर......सजीव से हो उठे अतृप्त ठहरे वो क्षण,अतृप्त सी इक जिजीविषा, विघटित सा होता ये मन!अनगिनत मथु के ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

हलचल व सम्मान

http://halchalwith5links.blogspot.in/2017/06/695.html?m=1&_utm_source=1-2-2*पाँच लिंकों का आनन्द*दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...*रविवार, 11 जून 2017**695.......  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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कुछ और दूरियाँ

अंततः चले जाना है हमें, इस जहाँ से कहीं दूर,शाश्वत सत्य व नि:शब्द चिरशांति के पार,उजालों से परिपूर्ण होगी वो अन्जानी सी जगह,चाह की चादर लपेटे धूलनिर्मित इस देह को बस,चलते हुए कुछ और दूरियाँ करनी...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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प्रेम के कल्पवृक्ष

ऐ नैसर्गिक प्रेम के मृदुल एहसास,फैल जाओ तुम फिर इन धमनियों में रक्त की तरह,फिर लेकर आओ वही मधुमास,के देखूँ जिधर भी मैं दिशाओं में मुड़कर,वात्सल्य हो, सहिष्णुता हो, हर आँखों मे हो विश्वास,लोभ, द्व...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

कोरी सी कल्पना

शायद है ये इक दिवास्वप्न या महज कोरी सी कल्पना!कविताओं में मैने जिसको हरपल विस्तार दिया,मन की भावों से इक रूप साकार किया,हृदय की तारों से मैने जिसको स्वीकार किया,अभिलाषा इक अपूर्ण सा मैने अंगी...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
10

मदान्ध

होकर मदान्ध सौंदर्य में, तू क्यों इतना इतराए रे....ऐ पुष्प तू है कोमल, तू है इतनी स्निग्ध,गिरी टूटकर जो शाखाओ से, है तेरा बचना संदिग्ध,हो विकसित नव प्रभात में, संध्या तू कुम्हलाए रे,चटकीली रंगों प...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

यादों के परदेश से

जब शाम ढली, इक नर्म सी हवा चली,अभिलाषा की इक नन्ही कली फिर से मन मे खिली,जाने कैसे मन यादों में बहक गया,सिसकी भरते अन्तर्मन का अंतर्घट तक रीत गया,तेरी यादों का ये मौसम, तन्हा ही बीत गया....तब जेठ हुई,...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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भूल चुका था मैं

भूल सा चुका था मैं, न गया था मैं मुड़कर उन्हे देखने...किताबों में दबी उन सूखी सी पत्तियों को...वर्जनाओं की झूठी सी परत में दबी उन बंदिशों को,समय की धूल खा चुकी मृत ख्वाहिशों को,क्षण भर को मन में हूक उ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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पिता की नजर से इक माँ

इक झलक पिता की नजर से पत्नी में समाई "माँ"......कहता है ये मन, स्नेहिल सी माँ है वो बस इक प्रेयसी नहीं,है इक कोरी सी कल्पना, या है वो इक ममता की छाँव..वो खूबसूरत से दो हाथ, वो कोमल से दो पाँव,वो ऊँगलियों प...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

कोणार्क

लो मैं चली कोणार्क, हूँ मैं अपने साजन की दुल्हन....ओ री बहकती चिलचिलाती लहकती सी किरण,है ये कोणार्क, न बढा अपनी ये तपिश अपनी ये जलन,कर दे जरा छाँव, मिटे तन की ये दहकती सी तपन,ओ री सुलगती तपतपाती दहकत...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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इक खलिश

पलकें अधखुली,छू गई सूरज की किरण पहली,अनमने ढंग से फिर नींद खुली।।।मन के सूने से प्रांगण में दूर तलक न था कोई,इक तुम्हारी याद! निंदाई पलकें झुकाए,सामने बैठी मिली...!मैं करता रहा,उसे अपनाने की कोशि...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

मोहब्बत

शब्दों की शक्ल में ढलती रही, इक तस्वीर सी वो!युँ ही कुछ लिखने लगा था मैं,शब्दों से कुछ भाव मन के बुनने लगा था मैं,दूर खुद से कहीं दूर होने लगा था मैं,फिर याद नहीं, ये क्या लिखने लगा था मै?तस्वीर से न...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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