पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

सुप्रिय जज्बात

जज्ब कर जज्बात बातों में,दो पल दे गया कोई साथ, तन्हा रातों में....खोया मैं उस पल, उनकी ही बातों में....टटोल कर, मेरा भावुक सा मन,बोल कर कई सुप्रिय वचन,पूछ कर न जाने, कितने ही प्रश्न,रख गया था कोई हाथ, मेर...  और पढ़ें
3 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

अपरिचित

ओ अपरिचित, अपना कुछ परिचय ही दे जाओ....विस्मित हूँ निरख कर मैं वो स्मित,बार-बार निरखूं, मैं इक वो ही अपरिचित,हिय हर जाओ, चित मेरा ले जाओ,विस्मित फिर से कर जाओ...ओ अपरिचित, अपना कुछ परिचय ही दे जाओ....हो क...  और पढ़ें
4 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

ब्रम्ह और मानव

सुना है! ब्रम्ह नें, रचकर रचाया ये रचना....खुद हाथों से अपने,ब्रम्हाण्ड को देकर विस्तार,रचकर रूप कई,गढ़ कर विविध आकार,किया है साकार उसने कोई सपना...सुना हैं! उन सपनों के ही इक रूप हैं हम....अंश उसी का स...  और पढ़ें
5 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

कहकशाँ

तुम हो, अस्तिव है कहीं न कहीं तुम्हारा....बादलों के पीछे, उस चाँद के सरीखे,लुकती छिपती, तू ही तू है दिखे,मन को न इक पल भी गंवारा,कि अस्तिव, कहीं भी नही है तुम्हारा....तुम हो, अस्तिव है कहीं न कहीं तुम्ह...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

मत कर ऐसी बात

मत कर फिर वो बात,सखी, अब दिल भर आया है....किस्मत का लेखा किसने देखा,समय ही दे गया धोखा,न वश मे थे हालात, फिर कैसा विलाप,संताप मिला जो किस्मत में था,विधि का था यही विधान,बात वही फिर काहे का दोहराना.....छे...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

अकेले प्रेम की कोशिश-(द्वितीय)

यूँ जारी है मेरी कोशिशें, अकेले ही प्रेम लिखने की....प्रेम बस अक्षर नहीं, कि जिसे लिख डालें,शब्दों का मेल नहीं, जिसे हर्फो से मिला लें,उष्मा है ये मन की, जो पत्थर पिघला दे,ठंढ़क है ये, जलते मन को जो स...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

बह जाते हैं नीर

जज्बातों में, बस यूँ ही बह जाते हैं नीर...असह्य हुई, जब भी पीड़,बंध तोड़ दे, जब मन का धीर,नैनों से बह जाते हैं नीर,बिन बोले, सब कुछ कह जाते हैं नीर...नीर नहीं, ये है इक भाषा,इक कूट शब्द, संकेत जरा सा,सुख-द...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

दायरा

ये अब किन दायरों में सिमट गए हो तुम...छोड़ कर बाबुल का आंगन,इक दहलीज ही तो बस लांघी थी तुमने!आशा के फूल खिले थे मन में,नैनों में थे आने वाले कल के सपने,उद्विग्नता मन में थी कहीं,विस्तृत आकाश था दामन...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

यूँ भी होता

यूँ भी होता............मन के क्षितिज पर,गर कहीं चाँद खिला होता,फिर अंधेरों से यहाँ,मुझको न कोई गिला होता!अनसुना ना करता,मन मेरे मन की बातें सुनता,बातें फिर कोई यहाँ,मुझसे करता या न करता!हो मन में जो लिख...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

बीहड़- इक याद

यदा कदा जाता हूँ मैं यादों के उन बीहड़ में....यत्र तत्र झाड़ झंखर, राहों में धूल कंकड़,कंटीली झाड़ियों से ढ़की, वीरान सी वो बीहड़,वृक्ष विशाल से उग आए हैं अब वहाँ,शेष है कुछ तस्वीरें, बसी है जिनसे व...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

बरसते घन

थमती ही नहीं, रिमझिम बारिश की बूँदें.....ये घन, रोज ही भर ले आती हैं बूँदें,भटकती है हर गली, गुजरता हूँ जिधर मैं,भीगोती है रोज ही, ढूंढकर मुझे...थमती ही नहीं, रिमझिम बारिश की बूँदें.....थमती ही नहीं, बूँद...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

दरिया का किनारा

हूँ मैं इक दरिया का खामोश सा किनारा....कितनी ही लहरें, यूँ छूकर गई मुझे,हर लहर, कुछ न कुछ कहकर गई है मुझे,दग्ध कर गई, कुछ लहरें तट को मेरे,खामोश रहा मै, लेकिन था मैं मन को हारा,गाती हैं लहरें, खामोश है ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

खेवैय्या

हो गुम कहाँ तुम, ऐ मेरे खेवैय्या!गहरी सी इस वापी में डोल रही मेरी नैय्या!धीरज थिरता था, पहले इस वापी में,धीर बड़ा मन को मिलता था इस वापी में,अब आब नहीं इसकी मन माफिक,तू खे मेरी ये नैय्या, जरा ध्यान ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

वही है जीवन

है जीवन वही, जो मरण के क्षण को जीत ले...झंकृत शब्दों से मौन को चीर दे,ठहरे पलों को अशांत सागर का नीर दे,टूटे मन को शांति का क्षीर दे,है जीवन वही......अचम्भित हूं मैं मौन जीवन पे,कब ठहरा है जीवन मौन की प्...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

प्रतिश्राव

वही तारसंवेदना केबार-बारक्यूं?छेड़ते हो तुम,अपनी हीसंवेदनाओं केप्रतिश्रावक्या!इन आँखो में,चाहते होदेखना तुम...!पीड़ा काहै नामुझकोतनिक भी भान,मैंगम सेहूँ बिल्कुलअंजान,दिखता हूँमैं जैसा,तू ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

कब हो सवेरा

ऐ नई सुबह! ऐ सूरज की नई किरण!इक नई उमंग, इक नया सवेरा तुम कब लाओगे?मुख मोड़ लिया, जिसने जीवन से,बस एकाकी जीते हैं जो, युगों-युगों से,बंधन जोड़ कर उन अंधियारों से,रिश्ता तोड़ दिया जिसने उजियारों से,क...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

अधूरा संवाद

करो ना कुछ बात, अभी अधूरा है ये संवाद.....बिन बोले तुम सो मत जाना,झूठमूठ ही, चाहे कुछ भी बतियाना,या मेरी बातों में तुम खो जाना,मुझको करनी है तुमसे, पूरी मन की बात,अभी अधूरा है इक संवाद......प्रिये, करो ना...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

दिल धड़कता ही नहीं

धड़कता ही नहीं है ये दिल आज-कल...संवेदन शून्य, संज्ञा विहीन हुआ दिल,गर उर कंठ इसे कोई लगाता,झकझोर कर धड़कनों को जगाता,घाव कुछ भाव से भर जाता,ये दिल! शायद फिर धड़क जाता!सिर्फ संवेदनाओं से इसे कैसे ज...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

दिल धड़कता ही नहीं

अब धड़कता ही नहीं ये दिल आज-कल...संवेदन शून्य, संज्ञा विहीन हुआ दिल,गर उर कंठ इसे कोई लगाता,झकझोर कर धड़कनों को जगाता,घाव कुछ भाव से भर जाता,ये दिल! शायद फिर धड़क जाता!सिर्फ संवेदनाओं से इसे कैसे ज...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

अब कहाँ कोई सदा

अब कहाँ है कोई सदा, जो फिर से पुकारता.....वो मृदु भाव कहाँ,है कहाँ अब वो मृदुल कंठ,पुकार ले जो स्नेह से,है कहाँ अब वो कोकिल से कंठ...वो सुख-चैन कहाँ,कहाँ है अब वो सुखद आँखें,मुड़कर जो दे सदाएं,है कहाँ अ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

फासले

यूं मिलिए कभी, गिरह नफ़रतों के खोलकर....चंद कदमों के है ये फासले,कभी नापिए न!इन दूरियों को चलकर...मिल ही जाएंगे रास्ते,कभी झांकिए न!इन खिड़कियों से निकलकर..संग जब भी कहीं डोलते हो,बेवजह बहुत बोलते ह...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

स्वतंत्रता (900वीं रचना)

लहराकर ये तिरंगा, कर रही है यही पुकार!सीमाएं हों सुरक्षित, राहें हों बाधा-रहित,बनें निर्भीक हम, हों सदा निर्विकार,प्रगति के पथ पर सबका हो अधिकार,मुक्त सांसों में स्वच्छंद हों विचार,क्लेश मिटे ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

ऋतु परिवर्तन

ॠतुओं का अनवरत परिवर्तन....क्या है ये.....यह संधि है या है ये संधि विच्छेद?अनवरत है या है क्षणिक प्रभेद,कई टुकड़ों में है विभक्त,या है ये अनुराग कोई अविभक्त,कैसा ये क्रमिक अनुगमन.....देखा है हमनें.....स...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

पड़ाव

स्नेहिल से कितने पड़ाव, और तय करेंगे हम?चलो तय कर चुके, यह भी पड़ाव हम,अब न जाने, ले जाए कहाँ ये बढते कदम!भले ही ये फासले, कुछ हो चले हैं कम,गंतव्य की ओर, जरा बढ़ चले हैं गम,छोड़ आए है पीछे, यादों के वो ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

द्वितीय संस्करण

सम्भव होता गर जीवन का द्वितीय संस्करण,समीक्षा कर लेता जीवन की भूलों का,फिर जी लेता इक नव-संस्करित जीवन!क्या मुमकिन है ये द्वितीय संस्करण?नए सिरे से होता, तब रिश्तों का नवीकरण,परिमार्जित कर लेत...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

वो तारे

गगन के पाश में,गहराते रात के अंक-पाश में,अंजाने से किस प्यास में,एकाकी हैं वो तारे!गहरे आकाश में,उन चमकीले तारों के पास में,शायद मेरी ही आस में,रहते हैं वो तारे!अंधेरों से मिलकर,सुबह के उजियारों ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

लिखता हूं अनुभव

निरंतर शब्दों मे पिरोता हूं अपने अनुभव....मैं लिखता हूं, क्यूंकि महसूस करता हूं,जागी है अब तक आत्मा मेरी,भाव-विहीन नहीं, भाव-विह्वल हूं,कठोर नहीं, हृदय कोमल हूं,आ चुभते हैं जब, तीर संवेदनाओं के,लह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

तू, मैं और प्यार

ऐसा ही है कुछ,तेरा प्यार...मैं स्तब्ध द्रष्टा,तू सहस्त्र जलधार,मौन मैं,तू बातें हजार!संकल्पना मैं,तू मूर्त रूप साकार,लघु मैं,तू वृहद आकार!हूं ख्वाब मैं,तू मेरी ही पुकार,नींद मैं,तू सपन साकार!ठहर...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

तन्हाईयाँ

हँस ले जी भर के,आज मुझपे ऐ तन्हाईयाँ,सजेंगी महफिलें,तब आऊंगा बुलाने मैं तुझे,जल जाएगा तू भी,देखकर मेरी कहकशां....चलो ये माना कि,तन्हा है आज हम यहाँ,न है वो काफिले,न ही है सितारों का कारवाँ,पर ये न स...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

भूलोगे कैसे

हर क्षण कण-कण मेरी याद दिलाएंगे......वो सूनी राहें, वो बलखाते से पल,बहते से लम्हे, ये हवाएं चंचल,वो टूटे पत्ते, वो बिखरा सा आँचल,यूं मुझमें खो जाओगे तुम,बहते लम्हों संग, उड़ आओगे तुम,मौसम के रंग बदलें...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5
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