पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

अजीब से फासले

बड़े अजीब से, हैं ये फासले....इन दूरियों के दरमियाँ,जतन से कहीं, न जाने कैसे, मन को कोई बांध ले..अजीब से हैं ये फासले....अदृश्य सा डोर कोई,बंधा सा कहीं, उलझाए, ये कस ले गिरह बांध ले...अजीब से हैं ये फास...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

अस्ताचल

ऐ मन चंचल! अवश्यम्भावी है अस्ताचल!पर धीरज रख, रश्मि-रथ फिर लौट आएगी कल....कर, तू जितनी मर्जी चल,आवरण, तू चाहे जितने भी बदल,दिशा, तू चाहे कोई भी निकल!मचल! मेरे मन, तू और जरा मचल!निश्चय है अस्ताचल!उद्दीप...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

25 वर्ष: संग मद्धम-मद्धम

साल दर साल......यूँ बीत रहा मद्धम-मद्धम,दो मन, दो धड़कन,इक संग, रहते हैं इक आंगण....दो विश्वास, चले परस्पर!संग, 25 वर्षों तक, इक पथ पर,विश्वास कहाँ होता खुद पर,अचम्भित करता सफर,चल रहा, संग-संग मद्धम-मद्धम.......  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

कहें-न-कहें

कुछ कहें, न कहें हम,या, कुछ लिखें, न लिखें हम,अनबोले से ये बोल, अनलिखे से ये शब्द,तुम पढ़ लेना....तन्हा इक पल भी, न होने देंगे तुम्हे,निश्छल से ये झर-झर झरने.....कल-कल से बहते ये क्षण, अनसुने से ये गीत, अन...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
1

सांध्य-स्वप्न

नित आए, पलकों के द्वारे, सांध्य-स्वप्न!अक्सर ही, ये सांध्य-स्वप्न!अनाहूत आ जाए,बातें कितनी ही, अनथक बतियाए,बिन मुँह खोले,मन ही मन, भन-भन-भन...छलावे सा, ये सांध्य-स्वप्न!छल कर जाए,हर-क्षण, भ्रम-जाल कोई...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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सुरभि

कुछ भूले, कुछ याद से रहे,कुछ वादे, दबकर किताबों में गुलाब से रहे,सुरभि, लौट आई है फिर वही,उन सूखे फूलों से....मुखरित, हुए फिर वो वादे,वो चटक रंग, वो चेहरे, वो रूप सीधे-सादे,सुरभि, लौट आई है फिर वही,उन खु...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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दो प्रस्तावना

दो स्वरूप जीवन के, रचता है ईश्वर!कामना के कई रंग देकर,वो हँसता है ऊपर,क्यूंकि, कल्पना से सर्वथा परे,बिल्कुल अलग-अलग,दो विपरीत कलाएँ, रचता है ईश्वर!बसंत ही बसंतया है पतझड़ ही पतझड़,हरितिमा अनंत ह...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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अजनबी चाह

बाकी रह गई है,कोई अजनबी सी चाह शायद....है बेहद अजीब सा मन!सब है हासिल,पर अजीज है, बस चाह वो,है अजनबी,पर है खास वो,दूर है,पर है पास वो,ख्वाब है,कर रहा है बेताब वो,कुछ फासलों से,यूँ गुजर रहे हैं, चाह शायद!स...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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बिखरे शब्द

शब्दों, के ये रंग गहरे!लेखनी से उतार, किसने पन्नों पे बिखेरे......विचलित, कर सके ना इन्हें,स्याह रंग के ये पहरे,रंगों में डूबकर, ये आए हैं पन्नों पे उभर,मोतियों से ये, अब हैं उभरे...शब्दों, के ये रंग गह...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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खुद लिखती है लेखनी

मैं क्या लिखूं! खुद लिख पड़ती है लेखनी....गीत-विहग उतरे जब द्वारे,भीने गीतों के रस, कंठ में डारे,तब बजते है, शब्दों के स्तम्भ,सुर में ढ़लते हैं, शब्द-शब्द!मैं क्या लिखूं! फिर खुद लिखती है लेखनी...भीगी...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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स्नेह तुम्हारा

बरस बीते, बीते अनगिनत पल कितने ही तेरे संग,सदियाँ बीती, मौसम बदले........अनदेखा सा कुछ अनवरत पाया है तुमसे,हाँ ! बस ! वो स्नेह ही है.....बदला नही वो आज भी, बस बदला है स्नेह का रंग।कभी चेहरे की शिकन से झलकता...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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बुझते दीप

कल ही दिवाली थी...कल ही, जलते दीयों को बुझते देखा मैनें....कल ही दिवाली थी...शामत, अंधेरों की, आनेवाली थी!कुछ दीप जले, प्रण लेकर,रौशन हुए, कुछ क्षण वो भभककर,फिर, उनको बुझता देखा मैनें,अंधेरी रातों को,फि...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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मेरी दिवाली

दीपक, इक मै भी चाहता हूँ जलाना....वो नन्हा जीवन,क्यूँ पल रहा है बेसहारा,अंधेरों से हारा,फुटपाथ पर फिरता मारा....सारे प्रश्नों केअंतहीन घेरो से बाहर निकल,बस चाहता हूँ सोचना,दीपक, इक मै भी चाहता हूँ ज...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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पन्ने अतीत के

पन्ने अतीत के कुछ,पलटे, अचानक हवाओं में बिखर गए!सदियों ये चुप थे पड़े,काल-कवलित व धूल-धुसरित,वक्त की परत मे दबे,मुक्त हुए, आज ये मुखर हुए!पन्ने अतीत के कुछ,पलटे, अचानक हवाओं में बिखर गए!फड़-फड़ाते ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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सर्द हवाएं

दस्तक ये कैसी, देकर गई सर्द सी हवाएं.....कहीं जम सी गईं है कुछ बूँद,कहीँ छाने लगी है आँखों में धुंध,कहीं ख्वाब बुनने लगा है मन,कहीं खामोशियां दे रही हैं सदाएं ....दस्तक ये कैसी, देकर गई सर्द सी हवाएं........  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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स्वप्न

रातों के एकाकी क्षण में,अतृप्त आवेगों से सुलगते वन में,जगता है रोज ही कोई स्वप्न,जगती है कोई तृष्णा,जग जाता है इक अतृप्त जीवन,इच्छाओं के फैलाए फन!रात के ढ़ेर पर......रोज ही जगते हैं सोये से वे क्षण,...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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पथ के आकर्षण

दामन में कब आते हैं!पथ के आकर्षण,पीछे पथ में ही रह जाते हैं .....इक पथ संग-संग, साथ चले थे वो पल,मन को जैसे, बांध चले थे वो पल,बस हाथों मे कब, कैद हुए हैं वो पल,वो आकर्षण, मन-मानस में बस जाते हैं!सघन वन में, ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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चाँद तक चलो

ओ प्रियतम, चाँद तलक तुम साथ चलो...नभ को लो निहार तुम,पहन लो, इन बाँहों के हार तुम,फलक तक साथ चलो,एक झलक, चाँद की तुम भर लो!ओ प्रियतम, चाँद तलक तुम साथ चलो...प्राणों का अवगुंठण लो,इस धड़कन का अनुगुंजन लो...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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यही थे राह वो

चले थे सदियों साथ जो, यही थे राह वो.....वक्त के कदमों तले, यही थे राह वो,गुमनाम से ये हो चले अब,है साथ इनके, वो टिमटिमाते से तारे,टूटते ख्वाबों के सहारे,ये राह सारे, अब है पतझड़ के मारे.....चले थे सदियों ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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श्वेत-श्याम

होने लगी है, श्वेत-श्याम अब ये शाम,लगने लगी है, इक अजनबी सी अब ये शाम....इक गगन था पास मेरे.....विस्तार लिए, भुजाओं का हार लिए,लोहित शाम, हर बार लिए,रंगो की फुहार, चंचल सी सदाएं,वो सरसराहट, उनके आने की आह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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मरुवृक्ष

अचल सदा, अटल सदा,तप्त वात में, मरुवृक्ष सा मैं रहा सदा....दहकते रहे कण-कण,पाया ना, छाँव कहीं इक क्षण,धूल ही धूल प्रतिक्षण,चक्रवात में, मरुवृक्ष सा रहा....अचल सदा, अटल सदा....रह-रह बहते बवंडर,वक्त बेवक्त, ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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गठबंधन

नाजुक डोर से इक,दो हृदय, आज जुड़ से गए...बंध बंधते रहे,तार मन के जुड़ते रहे,डबडबाए नैन,बांध तोड़ बहते रहे,चुप थे दो लब,चुपके से कुछ कह गए,गांठ रिश्तों के,इक नए से जुड़ गए....नाजुक डोर से इक,दो हृदय, आज ज...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
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उद्वेलित हृदय

मेरे हृदय के ताल को,सदा ही भरती रही भावों की नमीं,भावस्निग्ध करती रही,संवेदनाओं की भीगी जमीं.....तप्त हवाएं भी चली,सख्त शिलाएँ आकर इसपे गिरी,वेदनाओं से भी बिधी,मेरे हृदय की नम सी जमीं.....उठते रहे ल...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

इन्तजार

बस यूँ ही, उनसे हुई थी गुफ्तगू दो चार,शायद उन्हें था, उस तूफाँ के गुजर जाने का इन्तजार!था मुझे भी एक ही इन्तज़ार...,वो तूफाँ, गुजरता रहे इसी राह हर-बार!होती रही अनवरत बारिशें,दमकती रहे दामिनी, गरजते...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

नींद

कब नींद ढ़ुलकती है, नैनो में कब रात समाता है....सांझ ढले यूँ पलकों तले,हौले-हौले कोई नैनों को सहलाता है,ढ़लती सी इक राह पर,कोई हाथ पकड़ कहीं दूर लिए जाता है.....बंद पलकों को कर जाता है....कब नींद ढ़ुलकत...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

1,11,111 Views

1,11,111 Viewsसमस्त सम्माननीय पाठकों का हार्दिक धन्यवाददिनांक: 13.10.2018...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

मत कर इतने सवाल

कुछ तो रखा कर, अपने चेहरे का ख्याल......मत कर, इतने सवाल!ये उम्र है, ढ़लती जाएगी!हर शै, चेहरों पर रेखाएँ अंकित कर जाएंगी,छा जाएगा वक्त का मकरजाल!मत कर इतने सवाल.....!समय की, है ये मनमानी!बेरहम समय ये, किस श...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

ठहरी सी रात

ठहरी है क्यूँ ये रात यहीं .....क्या मेरे ही संग, नीरवता का मन भरा नहीं?हर क्षण, संग रही मेरे क्षणदा,खेल कौन सा, जो संग मेरे इसने ना खेला!ऊब चुका मैं, क्षणदा थकती ही नहीं,आँगन मेरे ही है ये क्यूँ रुकी?ठह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

अब कहाँ वो कहकशाँ

वो कहकशाँ, वो कदमों के निशां अब है कहाँ....अब न जाने, गुजरा है कहाँ वो कारवां,धूल है हर तरफ,फ़िज़ाओ में पिघला सा है धुआँ.....गुजर चुके है जो, वक्त की तेज धार में,वो रुके है याद में,वो शाम-ओ-शहर अब हैं कहा...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

ख्याल - धूरी के गिर्द

जागृत सा इक ख्याल और सौ-सौ सवाल.....हवाओं में उन्मुक्त,किसी विचरते हुए प॔छी की तरह,परन्तु, रेखांकित इक परिधि के भीतर,धूरी के इर्द-गिर्द,जागृत सा भटकता इक ख्याल!किसी वक्र पथ पर,केन्द्राभिमुख फिरत...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7
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