पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

कहीं यूं ही

ऐ मेघ, कहीं किसी देश तू चलता चल यूं ही!जा सावन ले आ, जा पर्वत से टकरा,या बन जा घटा, नभ पर लहरा,तेरे चलने में ही तेरा यौवन है,यह यौवन तेरा कितना मनभावन है,निष्प्राणों में प्राण तू फूंक यूं ही......ऐ मेघ, क...  और पढ़ें
6 घंटे पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

झ॔झावात

धुन में घुलते ये साज, बेसुरे हुए हैं क्यूं आज?जीवन के ये झंझावात,पल पल आँहों में, घिसते ये हालात,अन्तर्मन में पिसती कोई बात,धुन से भटकते ये साज.....ऐसे में मन को कोई छू जाए,दर्द दिलों के कम जाए,धुन ऐस...  और पढ़ें
13 घंटे पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

स्वार्थ

शायद, मैं तुझमें अपना ही स्वार्थ देखता हूं....तेरी मोहक सी मुस्काहट में,अपने चाहत की आहट सुनता हूंतेरी अलसाए पलकों में,सलोने जीवन के सपने बुनता हूं,उलझता हूं गेसूओं में तेरे,बाहों में जब भी तेरे...  और पढ़ें
4 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

कोलाहल

वो चुप था कितना, जीवन की इस कोलाहल में!सागर कितने ही, उसकी आँचल में,बादल कितने ही, उस कंटक से जंगल में,हैं बूंदे कितनी ही, उस काले बादल में,फिर क्यूं ये विचलन, ये संशय पल-पल में!वो चुप था कितना, शोर भ...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

विसाल-ए-यार

क्या दूं मै मिसाले यार? वो तो है बेमिसाल!यूं बुन रहा हूं मैं ये ख्याल,कभी तो मिल जाएगा विसाल-ए-यार,होश में न रह पाएंगे हम,वो कर जाएंगे हमें बेख्याल!क्या दूं मै मिसाले यार? वो तो है बेमिसाल!है आफताब ...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

बेखयाल

यूं ही बेखयाल थे हम, किसी के ख्याल में,कई ख्वाब देख डाले, हम यूं ही ख्वाब में........वो रंग है या नूर है,जो चढता ही जाए, वो सुरूर है,हाँ, वो कुछ तो जरूर है!यूं ही हमने देख डाले,हाँ, कई रंग ख्वाब में!यूं ही ब...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

नए नग्मे

नग्में नए गुनगुनाओ, मेरी पनाहो में आओ....तुम हर पल यूं ही मुस्कुराओ,तराने नए तुम बनाओ,नए जिन्दगी की नई ताल पर,झूमो यूं, मस्ती में आओ....नग्में नए गुनगुनाओ, मेरी पनाहो में आओ....तुम बहारों के दामन में ख...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

माँ कहती थी

मेरी माँ, मुझसे न जाने क्या-क्या कहती थी....जब वो पाँवो पे झुलाती थी,तो माँ कहती थी....घुघुआ मनेरिया, अरवा चौर के ढेरिया,ढेरिया उड़ियायल जाय,कुतवा रगिदले जाय,देखिहँ रे बुढिया,हमर बेटा जाय छौ, हड़िया...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

समग्रता की तलाश

समग्रता की तलाश में, व्यग्र यहाँ हर कोई,भटक रहा है मन, एकाग्रता है खोई......बस पा लेने को दो जून की रोटी,कोई जप रहा है कहीं राम-नाम,कोई बस बेचता है यूं ईश्वर की मूर्ति,कोई धर्म को बेचते हैं सरेआम,दिलो...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

ले गया चैन कोई

छीन कर मन का करार, ले गए वो चैन सारे....वो जो कहते थे, बस हम है तुम्हारे,सिर्फ हम थे कभी, जिनकी आँखों के तारे,करार वो ही मन के, ले गए हैं सारे,इन बेकरारियों में जीवन, कोई कैसे गुजारे?छीन कर मन का करार, ले...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

इक्षाओं के पंछी

इक्षाओं के प॔छी यूं ही उड़ते हैं पंख पसारे!कब साकार हुए है स्वप्न सारे......?कभी आकाश नही मिलता इक्षाओं को,कभी कम पड़ता हैं आकाश, इन्हे उड़ पाने को,काश! न होते इन जागी इक्षाओं के पर,काश! न जगते रातों ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

क्या हो तुम

क्या हो तुम? क्यूं आते हर पलों में याद हो....क्यूं मैं हूं, इक तुम्हारे ही आस में?कभी कुछ पल जो आओ अंकपाश में,बना लूं वो ही लम्हा खास मैं,भूल जाऊँ मैं खुद को, कुछ पल तुम्हारे साथ में...हो सुबह या सघन रा...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

भोर की पहली किरण

यूं अंगड़ाई लेकर उठी ये भोर की पहली किरण!घुल गई है रंग जैसे बादलों में,सिमट रही है चटक रंग किसी के आँचलों में,विहँसती खिल रही ये सारी कलियाँ,डाल पर डोलती हैं मगन ये तितलियाँ,प्रखर शतदल हुए हैं अ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

ओ बाबुल

ओ बाबुल! यूं भुला न देना, फिर पुकार लेना मुझे...कोई नन्ही कली सी, मैं तो थी खिली,तेरे ही आंगन तो मैं थी पली,चहकती थी मै, तेरा स्नेह पाकर,फुदकती थी मैं, तेरे गोद में आकर,वही ऐतबार, तु मेरा देना मुझे!ओ बा...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

सम्मोहन

हो बिन देखे ही जब भावों का संप्रेषण,उत्सुक सा रहता हो जब-तब ये मन,कोई संशय मन को तड़पाताा हो हर क्षण,पल पल फिर बढता है ये सम्मोहन....ये सम्मोहन के अनदेखे मंडराते से घन,नभ पर घनन-घनन गरजाते ये घन,शाय...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

अस्तित्व

कैसे भूलूं कि तेरे उस एक स्पर्श से ही था अस्तित्व मेरा....शायद! इक भूल ही थी वो मेरी!सोचता था कि मैं जानता हूँ खूब तुमको,पर कुछ भी बाकी न अब कहने को,न सुनने को ही कुछ अब रह गया है जब,लौट आया हूँ मैं अपन...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
12

माँ शारदे

हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!टूटे मन की इस वीणा को तू झंकार दे....हे, माँ शारदे! हे, माँ शारदे!...हम खोए है अंधकार में,अज्ञानता के तिमिर संसार में,तू ज्ञान की लौ जला,भूला हुआ हूं, राह कोई तो दिखा,मन मे प्र...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
9

रहस्य

दो नैनों के सागर में, रहस्य कई इस गागर में.....सुख में सजल, दुःख में ये विह्वल,यूं ही कभी खिल आते हैं बन के कँवल,शर्मीली से नैनों में कहीं दुल्हनं की,निश्छल प्रेम की अभिलाषा इन नैनों की....तिलिस्म जीव...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
10

ढ़हती मर्यादाएँ

ढ़हती रही उच्च मर्यादाओं की स्थापित दीवार!चलते रहे दो समानान्तर पटरियों पर,इन्सानी कृत्य और उनके विचार,लुटती रही अनमोल विरासतें और धरोहर,सभ्यताओं पर हुए जानलेवा प्रहार!ढहती रही उच्च मर्याद...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
14

दंगा

अब क्या हुआ जो मुझको कुछ भी भाता नही!क्युं इस गली अब कोई आता नही?वो कहते हैं कि हुए थे दंगे!दो रोटी को जब लड़ बैठे थे दो भूखे नंगे....अब तक है वो दोनो ही भूखे!है कौन उसे जो देखे?भूख से ऐंठती विलखती पेट ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

बिखरी लाली

चलों चुन लाएं, क्षितिज से वो बिखरी लाली.....श्रृंगकिरणों ने पट खोले हैं,घूंधट के पट नटखट नभ ने खोले हैं,बिखर गई है नभ पर लाली,निखर उठी है क्षितिज की आभा,निस्तेज हुए है अंधियारे,वो चमक रही किरणों की ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
16

किसलय

नील नभ के निलय में, खिल आए ये किसलय...नव आशा के निलय से,झांक रही वो कोमल किसलय,इक नई दशा, इक नई दिशा,करवट लेती इक नई उमंग का,नित दे रही ये आशय....नील नभ के निलय में, खिल आए ये किसलय...कोमल सी इन कलियों में,...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
16

सिमटते एहसास

कुछ तो है! जिसमें हर पल घिरा हैं ये मन .....है क्या ऐसी बात?हरा भरा सा है मन का ये आंगन,कहीं बजने लगती है संगीत,गूंज उठती है मन की ये सूनी वादी,कलरव करते ये विहग....खुला-खुला सा ये विस्तृत आकाश,उड़ने को आ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
18

भावनाओं के भँवर

ये आकर फसे हैं हम कहाँ.......भावनाओं के भँवर में,यातनाओं के इस सफर में,रात मे या दोपहर में....खुश थे कितने ही हम यहाँ......प्रस्फुटित हुई जब भावना,मोह वही दे रही ये प्रताड़ना,मन के इस खंडहर में.....कलपते रह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
11

भावना या यातना

तुम बहाओ ना मुझे, फिर उसी भावना में.....ठहर जाओ, न गीत ऐसे गाओ तुम,रुक भी जाओ, प्रणय पीर ना सुनाओ तुम,जी न पाऊँगा मैं, कभी इस यातना में....न सुन सकूंगा, मैं तुम्हारी ये व्यथा!फिर से प्रणय के टूटने की व्या...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
12

कशमकश

न जाने, दर्द का कौन सा शहर है अन्दर,लिखता हूं गीत, तो आँखें रीत जाती हैं,कहता हूं गजल, तो आँखें सजल हो जाती हैं...ये कशमकश का, कौन सा दौर है अन्दर,देखता हूं तुम्हें, तो आँखे भीग जाती हैं,सोचता हूं तुम...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
14

चुप्पी - बोलती खामोशी

यूं ही मन को न था, इन बातों में बहक जाना....चुप्पी तोड़ती हुई इक खामोशी,बंद लफ्जों की वो सरगोशी,वो नजरों की भाषा में चिल्लाना,दूर रहकर भी पास आ जाना,खामोशी का वो इक चुप सा तराना...यूं ही मन को न था, इन ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
14

चुप क्यूं हैं सारे?

लफ्जों पे जड़े ताले, चुप क्यूं रहते हैं सारे?जब लुटती है अस्मत अबला की,सरेआम तिरस्कृत होती है ये बेटियाँ,बिलखता है नारी सम्मान,तार तार होता है समाज का कोख,अधिकार टंग जाते हैं ताख पर,विस्तृत होत...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
16

संशय

कुछ पूछे बिन लौट आता है, मन बार-बार....पलते हैं इस मन शंका हजार,मन को घेरे हैं संशय, कर लेता हूं विचार!क्या सोचेंगे वो! क्या समझेंगे वो? क्या होगा उनका व्यवहार?गर, मन की वो बातें, रख दूं उतार!फिर, लाख...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
15

अधलिखा अफसाना

बंद पलकों तले, ढ़ूंढ़ता हूं वही छाँव मैं...कुछ देर को रुका था, देखकर वहीं गाँव मैं....अधलिखा सा इक अफसाना,ख्वाब वो ही पुराना,यूं छन से तेरा आ जाना,ज्यूं क्षितिज पर रंग उभर आना..और फिर....फिजाओं में संग...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
15
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