पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा
कविता "जीवन कलश" की पोस्ट्स

एकाकी वेला

एकाकी से इस वेला में, मन कितना अकेला है...ये रात है ! है निर्जन सा ये दूसरा पहर....नीरवता है फैली सी, बिखरी है खामोशी,चुप सी है रजनीगंधा, गहरी सी ये उदासी,चुपचाप बुझ-बुझ कर, जलते वो दीपक,गुमसुम चुप-चुप, ...  और पढ़ें
1 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

तो हो अच्छा

वाद-परिवाद, चर्चा-परिचर्चा,निष्कर्ष इन सबका हो कोई, तो हो अच्छा..होते रहे परिवाद, घटते रहे विवाद,मिटते रहे मन के सारे विषाद,कुछ याद रखने लायक हो जो वाद,स्वाद सबके जीवन में भरे, तो हो अच्छा...निरर्थ...  और पढ़ें
2 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

विचार

पी-पीकर अमृत, यहाँ रोज मर रहा मानव,विष के कुछ घूंट पीकर, क्या मर पाएगा मानव!विषपान किया जब जीवन का,तब ही जी पाया है मानव,जीवन के ज्वाला में जल जल,रोज ही जी रहा है मानव,व्यथा के भार सहकर, क्या मर पाएग...  और पढ़ें
3 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

खलल डालते ख्याल

भीगे से ये सपने .....डगमगाता सुकून,खलल डालते ख्याल,और तुम .....सवालों से बेहतर जवाबों मे,ख्यालों से बेहतर, मेरे जज्ब से इरादों मे.....कैसा ये सफर,कि तू होकर भी है कहीं बेखबर !तेरा स्मृति पटल में आना,फिर ध...  और पढ़ें
3 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

वक्त के परे

गर हो सके तो मिलो वक्त के परे स्वच्छंद.....इक राह अनन्त, वक्त के ये द्वन्द,रोके रुके ना, वक्त के ये छंद,वक्त के राह की, दिशाएँ दिग्दिगंत,लिए जा रहा वक्त, मुझको ये किस राह अनन्त....गर हो सके तो मिलो वक्त ...  और पढ़ें
5 दिन पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

अन्तर्धान हुई माँ

प्रतिक्षण देती आशीष विदा हुई मेरी माँ!नयनाभिराम सुलोचना थी वो,शब्दों में मुखरित विवेचना थी वो!नयनों से वो अन्तर्धान हुई!पंचतत्व में विलीन होकर, खामोश हुई माँ!प्रतिक्षण देती आशीष विदा हुई मेर...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

कुछ ऐसा ही है जीवन

दामन में कुछ भीगे से गुलाब,कांटों में उलझा बेपरवाह सा मन,कुछ ऐसा ही है जीवन.....यूँ अनाहूत ही आ जाना,बिन कुछ कहे यूँ ही चल देना,भीगी पलकों से बस यूँ रो लेना,यूँ एकटक क्षितिज देखना,मनमाना बेगाना सा य...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

पुराना किस्सा

नया तो कुछ भी नही, किस्सा है सब वही पुराना!हया की लाली आँखों पर छाना,इक पल में तेरा घबराना,शरमाकर चुपके से आँचल में छुप जाना,हाथों में वो कंगण खनकाना.....नया तो कुछ भी नही, किस्सा है सब वही पुराना!बा...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

खुदातर्स

नजरों में मेरी खुदातर्स हैं बस वो....प्रकृति प्रेमी हो श्रष्टा अनुगामी हो,परनिन्दा, आत्मप्रशंसा, अहंकार से दूरी रखते है जो,उद्भवन करते हों जो सद्गुण का,असद्गुणों का हृदय से उच्छादन करते हैं जो.....  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

जो मन को भाता है

वो, जो मन को भाता है,कहीं मुझको मीलों दूर लिए जाता है.......हौले से छू जाता है,नीरव पल में सहलाता हैकाल समय सीमा के परे,स्पंदन बन जाता है....वो, जो मन को भाता है,.......कभी मन ये दूर निकल जाता है,तन्हा फिर भी र...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

सृजन

शायद अब हो पूरा, प्रकृति का यह श्रृंगार अधूरा?एकत्र हुई है सब कलियाँ,चटक रंगों से करती रंगरलियाँ,डाल-डाल खिल आई नव-कोपल,खिलते फूलों के चेहरे हैं चंचल,सब पात-पात झूमे हैं,कलियों के चेहरे भँवरों न...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
2

गुनगुनी धूप

गुनगुनी धूप, खींच लाई दामन में मुझको...कई दिनों के सर्द मौसम में,मखमली एहसास दिला गई थी धूप,ठिठुरते कांपते बदन को,तपिश ने दी थी राहत थोड़ी सी...हरियाली निखरी पात पात में,बसंत की थपकी ले, खिली थी फूल,...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

इक दुर्घटना

विघटन के उस पल में आहत कितना था मन...दुर्घटना! आह वो विवश क्षण!कराहता तड़पता विवशता का क्षण,तम में डूबता, प्रिय का तन!सनकर लहू में, वो पिघलता सा बदन......विघटन के उस पल में आहत कितना था मन...क्षण भर में टू...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

हे ईश्वर

हे ईश्वर! कर मेरी प्रार्थना स्वीकार...मत देना तुम मुझको, ऐसा कोई प्रभात!बिन बात जहाँ, बढ जाती हो विवाद,बिन पतझड़ ही, बिखर जाते हों पात,बादल के रहते, सूखी सी हो बरसात,खुशियों के पल, मन में हो अवसाद....हे ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

परछाँई

उस तारे को देखना, नजर मैं ही आऊँगा...मैं आज भले हूँ सामने,कल शायद ना रह पाऊँगा!शब्दों के ये तोहफे,फिर तुझे ना दे पाऊँगा!दिन ढ़ले इक टीस उठे जब,उस तारे को देखना, नजर मैं ही आऊँगा...हूँ बस इक परछाँई मैं,...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

परछाँई

उस तारे को देखना, नजर मैं ही आऊँगा...मैं आज भले हूँ सामने,कल शायद ना रह पाऊँगा!शब्दों के ये तोहफे,फिर तुझे ना दे पाऊँगा!दिन ढ़ले इक टीस उठे जब,उस तारे को देखना, नजर मैं ही आऊँगा...हूँ बस इक परछाँई मैं,...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
8

तिरंगा गणतंत्र

1. उठो देशउठो देश! यह दिवस है स्वराज का,गणतंत्र का, गण के तंत्र का,पर क्युँ लगता?यह गणराज्य कहीं है बिखरी सी,जंजीरों में जकरा है मन,स्वाधीनता है खोई सी,पावन्दियों के हैं पहरे,मन की अभिलाषा है स...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
11

तिरंगा गणतंत्र

1. उठो देशउठो देश! यह दिवस है स्वराज का, गणतंत्र का, गण के तंत्र का,पर क्युँ लगता? यह गणराज्य कहीं है बिखरी सी,जंजीरों में जकरा है मन, स्वाधीनता है खोई सी,पावन्दियों के हैं पहरे, मन की अभिलाषा है सोई ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
9

उम्र

ऐ उम्र, जरा ठहर!  ऐसी भी क्या है जल्दी!अब तक बीता ये जीवन व्यर्थ ही,अर्थ जीवन का मिला नहीं,कुछ अर्थपूर्ण करना है अभी-अभी,ठहर ना, तू बीत रही क्यूँ जल्दी-जल्दी? अभी खुल कर हमने जिया नहीं,मन का कुछ भ...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

जीवन-चंद दिन

क्या है ये जीवन...?कुछ आती जाती साँसों का आश्वासन!कुछ बीती बातों का विश्लेषण!या खिलते पल मे सदियों का आकर्षण!सोच रहा मन क्या है ये जीवन?कैसा ये आश्वासन?हिस्से में तो सबके है ये चंद दिन,हैं कुछ गिन...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

आवाज न देना

ऐ भूली सी यादें, आवाज न देना तुम कभी....सदियों की नीरवता से, मैं लौटा हूँ अभी अभी ।सदियों तक था तुझमें ही अनुरक्त मै,पाया ही क्या, जब तुझसे ही रहा विरक्त मैं?मिली बस पीड़ा और बेचैन घड़ी,अंतहीन प्रतीक्...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

दिल की सरखत

दिल की सरखत पे मेरे,तुम दस्तखत किए जाते हो.....मेरी बातों में तुम, यूँ शामिल हुए जाते हो....बड़ी सूनी थी ये सरखत,हर पन्ने मे तुम नजर आते हो,मेरी तन्हाईयो में तुम, यूँ ही चले आते हो....हर लम्हा इन्तजार तेर...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

बवाल जिन्दगी

संवेदनाओं के सरसब्ज ताल में, खुशहाल जिन्दगी...बड़ी बवाल जिन्दगी, बेमिसाल जिन्दगी,मसरूफियत में है, सरसब्ज सवाल जिन्दगी,सारे सवाल का है जवाब जिन्दगी,सराहत से परे, व्यस्त और बवाल जिन्दगी!वेदनाओं स...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7

मुख्तसर सी बात

मुख्तसर सी वो ही बातें, सुनी कर गईं रातें.....जब से गए तुम रहबर,न ली सुधि मेरी,न भेजी तूने कोई भी खबर,हुए तुम क्यूँ बेखबर?तन्हा सजी ये महफिल,विरान हुई राहें,सजल ये नैन हुए,तुम नैन क्यूँ फेर गए?मुख्तस...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

अलाव

रात भर जलती रही थी उसके मन की अलाव...नंगे बच्चों की भूख, तड़प की पीड़ा,माथे पे शिकन, आँखों में जलन, काँपता तन,सुलगाती रही उस मन में इक अलाव....न आया कोई भी सुधि लेने उस अलाव की...ठिठुरती ठंढ़ मे, क्षणिक रा...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
6

मकर संक्रंति

नवभाव, नव-चेतन ले आई, ये संक्रांति की वेला........तिल-तिल प्रखर हो रही अब किरण,उत्तरायण हुआ सूर्य निखरने लगा है आंगन,न होंगे विस्तृत अब निराशा के दामन,मिटेंगे अंधेरे, तिल-तिल घटेंगे क्लेश के पल,हर्ष, ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

वही पल

गूंजते से पल वही, कहते हैं मुझको चल कहीं.........निर्बाध समय के, इस मौन बहती सी धार में,वियावान में, घटाटोप से अंधकार में,हिचकोले लेती, जीवन की कश्ती,बलखाती सी, कभी डूबती, कभी तैरती,बह रही थी कहीं, यूँ ह...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
3

विप्रलब्धा

वो आएँगे, यह जान कर....उस सूने मन ने की थी उत्सव की तैयारी,आष्लेशित थी साँसे उनमें ही,तकती थी ये आँखें, राहें उनकी ही,खुद को ही थी वो हारी.....रंग भरे थे उसने आँचल में,दो नैन सजे थे, उनके गहरे से काजल में...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
5

बिछड़े जो अब

अबकी जो बिछड़े, तो ख्वाबों में ही मिलेंगे कहीं..शाख पर लिपटती बेलें यूँ ही कुछ कह गई,ढलती रही सांझ ख्यालों में ही कहीं,कोई भीनी सी हवा तन को छूकर थी गई,दस्तक दबे पांव देकर गया था कोई,ये सरसराहट सी ह...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
4

मेरा ही साया

वो नही कोई पराया, था वो बस मेरा ही साया.......रहा ढूंढता वो सदा मेरी ही काया,मेरी ही सासों की धुन पर वो गाया,पाँवों तले जिसने जीवन बिताया,वो कोई गैर नहीं, था वो मेरा ही साया.......छाँव तनिक न जिसे रास आया,क...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
कविता "जीवन कलश"
7
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