Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध ) की पोस्ट्स

ढाई आखर

2 घंटे पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
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#चाय #CHAI

3 दिन पूर्व
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मरे हुए लोग

मरे हुए लोगमरते हैं रोज-रोजथोड़ा- थोड़ा,अपनी निकलती साँसों के साथमर जाता है उनका उत्साह,हंसते नहीं है कभीन ही बोलते है,अपनी धड़कनों के साथबजता है उनका शरीरजैसे पुराने खंडहरों मेंतड़पती हो कोइ आत...  और पढ़ें
5 दिन पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
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तहज़ीब

6 दिन पूर्व
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पीठ या चेहरा.....

सोचती हूँ.... कितनी भद्दी हो गयी होगी मेरी  पीठतुम्हारी पिटाई से,लगातार रिसते ख़ून के धब्बे,नीलशाह, अनगिनत ज़ख्म...........फिर सोचती हूँ....तुम्हारे चहरे से ज्यादा भद्दी तो न होगीकितना कुरूप लगता था त...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
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'ए फॉर एप्पल'नहीं 'ए फॉर अनन्या'

सीकचों से झांकती हुई नन्ही परी इशारा करती हैबुलाती है मुझे बुदबुदाती है धीरे से मेरे कान में मुझे भी आता है 'ए फॉर एप्पल 'नम्बर्स भी; पूरे हंड्रेड तक!एक बड़ी सी मुस्कराहट के साथ सरगोशी कर...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
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इंसानों के बीच एक दिन

गलियों में घूमते हुए बरबस ही खींचती है गरम - गरम भात की महक,दरवाजा खुला ही रहता है हमेशा यहाँ बंद नहीं होते कपाट चोर आकर क्या ले जायेंगे.जिस घर  चाहूं घुस जाऊं तुरत परोसी जायेगी थाली म...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
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मेरी पाज़ेब

1 सप्ताह पूर्व
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कीमती है!

अन्न धन है अन्न मन है अन्न से  जीवन सुगम है अन्न थाली अन्न बाली अन्न बिन धरती है खाली अन्न धर्म  है अन्न मर्म है अन्न ही सबका कर्म है  अन्न संस्कार है अन्न बाज़ार है अन्न ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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बाकी है अब भी!

जब- जब तुम्हे मिलने निकलती हूँबादलों के मेलें में गुम हो जाती हूँतुम, चाँद बन इठलाते हो,खेलते हो छुपंछुपाईहवा के झूलों पर उड़ती हूँदौड़ती हूँ तुम्हे छूने को हज़ार कोशिशें करती हूँ और तुम!भागत...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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टहनियों की पंहुच

उसके साथ आलिंगनबद्ध होने पर भी,खींच ही लाती हैं मेरी टहनियां तुम्हेऔर वो तकती है मेरी राहकि कब पंहुचेगे मेरे हाथ उसके तने तकजानती नहींपरजीवी हूँ जीती हूं तुम्हारा ही रस पीकरतुम्ही से है मे...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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नाक और इशारे

इशारे कर सकता है कोइ भी,विद्यालय का प्रधानाचार्य,आफिस में बॉसबाप की उम्र का पड़ोसी साथ बैठ कर काम करने वाला कलीगकभी कभी रिक्शेवाला भी.इशारे करना अफोर्ड कर सकता है हर मर्दगरीब-अमीर, मालिक -नौक...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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बिनब्याही

बार- बार उलझ जाती हैं बुआ की नज़रें लाल-लाल चूनर में,पैंतालीस की उम्र में भी बुआ;झांकती हैं धीरे से झरोखा कि देख न ले कोई कुंआरी लड़की को झांकते हुए,दरवाजे पर आज भी नहीं खड़ी होती,चुपचाप हट जाती ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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#चुनाव

3 सप्ताह पूर्व
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बड़ी बेपरवाह हो!

वो आख़िरी चुम्बन तुम्हारा और झटके से पलट जाना भूलता क्यों नहीं?सरे बाज़ार उठ कर चली आती हो,पकडती हो हाँथ और खींच लेती हो मुझे मेरे समय से.अतीत हो जानता हूँ,छू नहीं सकता तुम्हें अब सोचना भी पा...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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मृत्यु से पहले की उम्मीद ( #Road Accident)

दूर हूँ बहुत उनसे ,तुमसे ,खुद से, अपनी ही साँसे पता नहीं चल रहीं, नहीं मालूम दिल धड़क भी रहा है या नहीं,जानता हूँ, ज़िंदा हूँ अभी लहू- लुहान पड़ा हूँआँखें बंद, होंठ खामोश प्यास का लहलहाता समं...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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प्रेम के हरे रहने तक!

पलाश के लाल-लाल फूल खिलते हैं जंगल में,मेरा सूरज उगता है तुम्हारी आँखों में,मांग लेती हूँ धूप  थोड़ी सी तुमसे;न जाने कब,हमारे प्रेम का सूरज डूब जाए मुरझा जाएँ पलाश मरणासन्न हो जाये जंगल,...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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लंच बाक्स से झांकता है समाजवाद

बच्चों के लंच बाक्स से झांकता है समाजवाद,कि कुछ डिब्बों में रखी होती हैं करारी- कुप्पा तली हुयी पूरियां और कंही, चुपके से झांकती है तेल चुपड़ी तुड़ी-मुड़ी रोटी,कुछ बच्चे खाते हैं चटखारे लेकर-ल...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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कविता के मायने

कविता के सिरहने पड़ी हैंकितनी अबूझ पहेलियाँ,   मेरा- तुम्हारा प्रेम,हमारे सीले दिनों की यादें,दर्द सिर पर रखे भारी समझौतों वाले दिन;और कविता के पैताने!वो हाँथ जोड़ कर बैठना,कि एक दिन लौट आयेंग...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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स्टेशन पर बाल दिवस (लघुकथा)

कल छुट्टी मिलेगी साहब , राजू ने सकुचाते हुए पूछा। कैसी छुट्टी? "परसो ही तो आया है तू काम पर वापस आया है और फिर छुट्टी माँगने लगा.अब क्या काम आ गया". सेठ फूलचंद ने रुपए गिनते हुए कहा. राजू कुछ देर चुप...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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सरकारी दस्तावेज़ों में थर्ड जेंडर हूँ!

न औरत हूँ न मर्द हूँ अपने जन्मदाता का अनवरत दर्द हूँ. सुन्दर नहीं हूँ , असुंदर भी नहीं हुस्न और इश्क का सिकंदर भी नहीं।मखौल हूँ समाज का, हंसी का लिबास हूँ,गलत ही सही ईश्वर का हिसाब हूँ.जान मु...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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रंगमंच पर टंगे चेहरे (लघुकथा )

1.रौशनी से नहाये हुए मंच पर परियां खिलखिलाती हैं, झूमती हैं, मस्तानी अदाएं दिखाती है.सीटी बजाते हैं लड़के, पीछा करते है, छेड़ते हैं, आहें भरते हैंरंगीन गुबारों को हवा में उड़ाकर;प्रेम का इज़हार करते ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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मर्द हूँ, अभिशप्त हूँ

मर्द हूँ, अभिशप्त हूँ, जीवन के दुखों से बेहद संतप्त हूँ। बोल नहीं सकता कह नहीं सकता सबके सामने मै रो नहीं सकता.भरी भीड़ में रेंगता है हाँथ कोई मेरी पीठ पर;और मैंकुछ नहीं बोलता,कह ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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लघुकथा - अफ़वाह के हाँथ

लघुकथा - अफ़वाह के हाँथक्या खाला, बस इतनी सी सब्जी, थोड़ी और दो न! रेहाना मिन्नत करती हुई बोली. "न और नहीं, दोपहर को भी खाना है, तुम्हारे खालू अभी दूकान से आकर खायेंगे.आज कुछ और सब्जी भी नहीं है,गैस भी ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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#Life

2 माह पूर्व
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भूख का इंकलाब!

जब तुम दलीलें दे रहे थे भूख से नहीं मर रहे बच्चे, रिक्शा चालाक और मजदूर,तब सड़क पर खड़े एक भिखमंगे ने फेंक दिया था खोलकर अपने शरीर पर बचा एक मात्र अधोवस्त्र,खड़ा हो गया था नंगा शासन के ख़िला...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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पत्थर होना भी आसान नहीं होता. #Rock

तमामबहसमुबाहिसोंकोभुलाकरहमपत्त्थरहुएथे,सोचाथाउगनेनदेंगेएकभीभावकमजोरीका,एकभीपलयादनकरेंगेअपनाजख्म,, अगरउगनेलगेगीघासमुझपर; नमीनहींसोकनेदेंगेउसे.नहीपड़नेदेंगेपरछाईफूलोंकी, मिट्टी...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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मंहगाई में त्यौहार

चीनी मंहगी, गुड़ भी मंहगी मंहगा दूध मिठाई है, खील बताशे मंहगे हो गए क्योँ दीवाली आयी है?एक नहीं, दो नहीं, दस नहीं खुशियों से है भरा बाज़ार, कुछ लोगों की जेबें भरता जाल बिछा है अपरम्पार.खाली चूल्हा, ज...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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6

#दीवाली #Festival

2 माह पूर्व
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