Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध ) की पोस्ट्स

आँचल में सीप

तुम्हारी सीप सी आंखेंऔर ये अश्क के मोती,बाख़बर हैं इश्क़ की रवायत से...तलब थी एक अनछुए पल कीजानमाज बिछी;ख़ुदा से वास्ता बनातुम्हारी पलकों ने करवट लीदुआ में हाँथ उठा बीज ने कुछ माँग लियामेघ बरसे,&n...  और पढ़ें
3 दिन पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
1

मौत का सौदा

हाशिये पर खड़े लोग, प्रतीक्षारत हैं अपनी बारी की,उनकी आवाज़ में दम है,सही मंतव्य के साथ मांगते हैं अपना हक़,कर्ज के नाम पर बंट रही मौत को लगाते हैं गले,अपनी ही ज़मीन पर रौंद दिये जाते हैं;कर्ज लेक...  और पढ़ें
5 दिन पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
4

आदमी होने का मतलब

मैं एक आदमी हूँ मौत से भागता हुआ भरमाता हुआ ख़ुद को कि मौत कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी मेरा....मैं एक कसाई हूँ,मौत का रोज़गार करता हुआ ज़िंदा हूँ अपनी संवेदनाओं समेतकटे हुए जानवरों की अस्थियों मे...  और पढ़ें
6 दिन पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
3

देख कर भी जो नहीं देखा !

एक कविता.... कुछ अदेखा सा जो यूं ही गुज़र जाता है व्यस्त लम्हों के गुजरने के साथ और हम देखकर भी नहीं देख पाते , न उसका सौंदर्य , न उसकी पीड़ा, न ख़ामोशी , और न ही संवेग सब कुछ किसी मशीन से निकलते उत्पाद क...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
3

कहो कालिदास , सुनें मेरी आवाज़ में

विद्वता के बोझ तले दबे हर पुरुष को समर्पित यह कविता मेरी आवाज़ में सुनें...यह कविता आप इससे पूर्व वाली पोस्ट में पढ़ भी सकते हैं......  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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3

दहलीज़ पर कालिदास

कहो कालिदास,आज दिन भर क्या किया,धूप में खड़े खड़े पीले तो नहीं पड़े,गंगा यमुना बहती रही स्वेद कीऔर तुम.... उफ़ भी  नहीं करते ,कहो कालिदास,कैसा लगा मालविका की नज़रों से विलग होकर,तुम लौट-लौट कर आते रहे उ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
3

एक चिड़िया का घर

एक चिड़िया उड़ती हैबादलों के उस पार..उसकी चूं-चूं सुन,जागता है सूरज,उसके पंखों से छन कर, आती है ठंढी हवा, गुनगुनाती है जब चिड़िया,आसमान तारों से भर जाता है,धरती से उठने वाली; साजिशों की हुंकार स...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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4

ये सरकारी कार्यालय है!

अजी ये भी कोई वक़्त है,दिन के बारह ही तो बजे हैं,अभी-अभी तो कार्यालय सजे हैं,साहब घर से निकल गए है,कार्यालय नहीं आये तो कंहा गए हैं,ज़रा चाय-पानी लाओ,गले को तर करवाओ,सरकारी कार्यालय है,भीड़ लगना आम है,...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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4

नया इतिहास

मेरी जेबों में तुम्हारा इतिहास पड़ा है कितना बेतरतीब था; तुम्हारा भूत..... वक्त की नब्ज़ पर हाँथ रख,पकड़ न पाया समाज का मर्ज़,मुगालते में ही रहा; कि... वक्त मेरी मुट्ठी में है,कानों में तेल डाल, सुनता र...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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5

माँ बनना.... न बनना

लेबर रूम के बेड पर तड़पती हुई स्त्री जब देती है जन्म एक और जीव को तब वह मरकर एक बार फिर जन्म लेती हैअपने ही तन में,अपने ही मन में,उसके अंतस में अचानक बहती है एक कोमल नदीजिसे वह समझती है धीरे धीर...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
6

मैंने देखा है.... कई बार देखा है

मैंने देखा है,कई बार देखा है,उम्र को छला जाते हुए,बुझते हुए चराग में रौशनी बढ़ते हुए,बूढ़ी आँखों में बचपन को उगते हुएमैंने देखा है...कई बार देखा है,मैंने देखा है बूँद को बादल बनते हुए,गाते हुए लोर...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
4

घूँट--घूँट प्यास

( नोट- कविता में बेवा के घर को सिर्फ एक प्रतीक के तौर पर) पढ़ें।...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
14

इंतज़ार एक किताब का!

उसने मुझे बड़ी हसरत से उठाया था,सहलाया था मेरा अक्स,स्नेह से देखा था ऊपर से नीचे तक, आगे से पीछे तक,होंठों के पास ले जाकरहौले से चूम लिया था मुझे और.... बेसाख्ता नज़रें घुमाई थीं चारों ओरकि...... किस...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
5

हिंदी कविता - दुनिया का सच

मेरी कविता 'दुनिया का सच'सुनें मेरी आवाज़ में जो की सामाजिक बाज़ार में स्त्री की व्यथा से आपको रूबरू करवाती है।आपकी प्रतिक्रियाएं मेरे लिए अमूल्य हैं कृपया अपनी प्रतिक्रियाएं अवश्य दें ताकि...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
6

दूर हूँ....कि पास हूँ

मैं बार-बार मुस्कुरा उठता हूँ तुम्हारे होंठो के बीच,बेवज़ह निकल जाता हूँ तुम्हारी आह में,जब भी उठाती हो कलमलिख जाता हूँ तुम्हारे हर हर्फ़ में,कहती हो दूर रहो मुझसे....फ़िर क्यों आसमान में उकेरती ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
7

झूठे बाज़ार में औरत

एक पूरा युगअपने भीतर जी रही है स्त्री,कहती है ख़ुद को नासमझ,उगाह नहीं पायी अब तकअपनी अस्मिता का मूल्य,मीडिया की बनाई छवि मेंघुट-घुट कर होंठ सी लेती है स्त्री,सड़कों पर कैंडल मार्च करती भीड़ मेंअस...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
6

एक कवि से उम्मीद!

लिखो प्रेम कवितायेँकि..... प्रेम ही बचा सकेगातिल-तिल मरती मानवता को,प्रेम की अंगड़ाई जब घुट रही हो सरेआम,मौत के घाट उतार दिए जा रहे हों प्रेमी युगल,कल्पना करोप्रेम के राग में सड़ांध भरती सिक्कों क...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
9

डरती हूँ मैं!

जब भी, फ़िर से, काम पर जाने की इच्छा, उठाती है सिर,ज़मीदोज़ कर देती हूँ उसे,आख़िर एक नन्ही सी बच्ची की माँ जो हूँ......घर में, मंदिर में, अस्पताल में, स्कूल में, सड़क पर,बस में,ट्रेन में.... सब जग...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
12

विदा का नृत्य

मैं तुममें उतना ही देखता हूँ,जितना बची हो तुम मुझमें,किंवाड़ से लगकर भीतर झांकती तुम्हारी आँखें,निकाल ले जाती हैं मुझेपूरा का पूरा,जीवन भर,पुआल के ढेर पर सोता मैं,सुस्ताता हूँ थोड़ी देर,डनलप के ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
10

विदा का नृत्य

मैं तुममें उतना ही देखता हूँ,जितना बची हो तुम मुझमें,किंवाड़ से लगकर भीतर झांकती तुम्हारी आँखें,निकाल ले जाती हैं मुझेपूरा का पूरा,जीवन भर,पुआल के ढेर पर सोता मैं,सुस्ताता हूँ थोड़ी देर,डनलप के ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
9

समय की उड़ान

ढिबरी की रौशनी में पढ़ती हुई लड़कीभरती है हौंसलों की उड़ान,अंतरिक्ष का चक्कर लगाती हैचाँद तारों को समेट लाती है अपनी मुट्ठी में,जब जब आंसुओं के मोती देखती हैमाँ की आँखों में,खिलखिलाकर एक सूरज उग...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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13

पूर्ण विराम कंहा है!

एक नृशंस कालखंड दर्ज हो रहा है इतिहास में            भीड़ की तानाशाही और रक्तिम व्यवहारताकत का अमानवीय प्रदर्शनक़ानून की धज्जियाँ उड़ाता शाशन-प्रशासन....हिंसा हथियार है और अविवेक मार्गदर्...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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11

अंत हुआ तो ख़ाली दामन

फूल यूं मुस्कुराये कि गिर गएशाख़ को गमज़दा छोड़कर, तितलियां आजकलनहीं आतीझर रहीं पत्तियां बेसबब यूं ही।रात तूफ़ां ने यूं क़यामत कीझुग्गियां उजड़ी, मर गयी साँसे,गिर गए ईमान संग दरख़्त कितनेकब्र खो...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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16

धार्मिक तन्हाई का दंश

धर्म का लाउडस्पीकरजब उड़ेलता है उन्माद का गंदा नशाहाँथ पैर हो जाते हैं अंधे,नौजवान खून उबाल मारता है,मासूम हाँथ रंग जाते हैं अपनों के खून से,ज़ालिम दिमाग़ कोनों में मुस्कुराते हैं,राजनीति की रो...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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14

तेरी सुरमयी याद में गुलाबी हम

 प्रेम के पैरहन मेंखूबसूरत लड़ियाँ पड़ीं हैहमारे स्पर्श की, नैनों ने कहा कुछ....कि अफ़सानों ने चलना शुरू किया,रात की उतरन ने गुलाबी सूरज थमायाहरी चूड़ियों ने बोये कुछ कचनार रजनी गंधा की कलिया...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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13

कल वाले लेमनचूस!

थोड़ा पागलपन भेजवादोऔर ज़रा से लेमनचूस,जीवन इतना खट्टा हो गयादिल के इन गड्ढों से पूछ। भोर का सूरज जगा नहीं है चंदा निदिया को तरसे,फूल गंध से बिछड़ गए हैंबादल पूछें क्यों बरसें।कोई आकार कह दो ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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19

शून्य हैं हम

हर गिरता हुआ पत्त्ताकरता है शाख़ से बेपनाह मोहब्बत, होता है उदास अपने विलग होने से,शाख़ भी मनाती है शोक;रोती है, उदास होती है,देखती है जमीं पर उन्हें मरते हुए.....एक दिन समझ लेती है वो भी धोखा नही...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
25

प्रणय रंग की बतियाँ

मेरे अधरों पर जब उनके गीत निखरते हैं,मैं उनमे वो मुझमें कुछ ऐसे बसते हैं, वासंती मदमस्त हिलोरें उठती नैनों में, मेरे हिय में उनकी साँसे जीवन रचती हैं.रंग रंग के फूल खिले हैं रंगीला है मौसम, ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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22

वे गायब हैं!

एक सच यह है कि...... बलात्कृत स्त्री साँसे नहीं लेती, हवाओं में चेहरा नहीं उठाती,नज़रें नहीं मिलाती खुद से समझती है खुद को मृत जबकि;बलात्कार सिर्फ स्त्री का नहीं होता..... बलात्कार होता है स...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
27

मुझे लिखा जाना बाकी है अभी!

मैं एक खत हूँ;मुझे लिखा जाना बाकी है अभी,गुलाबी सफहों के जिस्म में ढलकरसुर्ख स्याही के मोतियों से सजकरमेरा पैग़ाम बन इठलाना बाकी है अभी,हयात चार दिनी और बची है मुझमेंउसके हांथों में लरजता हुआ ट...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
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