Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध ) की पोस्ट्स

खरीद -फ़रोख़्त (#Human trafficking)

बिकना मुश्किल नहींन ही बेचना,मुश्किल है गायब हो जाना,लुभावने वादों और पैसों की खनकखींच लेती हैइंसान को बाज़ार में,गांवो से गायब हो रही हैं बेटियां,बेचे जा रहे हैं बच्चे,आंखों से लुढ़कने वाले आँ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
2

मंदिर में महिलाएं

अधजगी नींद सीकुछ बेचैन हैं तुम्हारी आंखें,आज काजल कुछ उदास हैथकान सी पसरी है होंठों के बीचहंसी से दूर छिटक गई है खनक,आओ न,अपनी देह पर उभर आए ये बादल,सृजन की शक्ति के सार्थक चिन्हों का स्वागत करो...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
2

#me too

भीतर कौंधती है बिजली,कांप जाता है तन अनायास,दिल की धड़कन लगाती है रेस,और रक्त....जम जाता है,डरबोलता नहींकहता नहीं,नाचता है आंख की पुतलियों के साथ,कंपकंपाते होंठ और थरथराता ज़िस्म,लुढ़कता है आदिम सभ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
9

उम्र का हिसाब

उस दिन कुछ धागेबस यूं ही लपेट दिए बरगद में,और जोड़ने लगी उम्र का हिसाबउंगलियों पर पड़े निशान,सच ही बोलते हैं,एक पत्ता गिरा,कह गया सच,धागों से उम्र न बढ़ती है,न घटती है,उतर ही जाता है उम्र का उबाल एक द...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
12

प्रेम-राग

बड़ा पावन हैधरती और बारिश का रिश्ता,झूम कर नाचती बारिश औरमह-मह महकती धरती;बनती है सृष्टि का आधार,उगते हैं बीज,नए जीवन का आगाज़,शाश्वत प्रेम का अनूठा उपहार,बारिश और धरती का मधुर राग,उन्मुक्त हवाओ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
5

समलैंगिक प्रेम

बड़ा अजीब है प्रेम,किसी को भी हो जाता है,लड़की को लड़की से,लड़के को लड़के से भी,समलैंगिक प्रेम खड़ा है कटघरे में,अपराध है सभ्य समाज में,नथ और नाक के रिश्ते की तरह,बड़ा गज़ब होता है,एक होंठ पर दूसरे होंठ का ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
7

भीड़ का ज़मीर

मैं इस बार मिलूँगीभीड़ में निर्वस्त्र,नींद जब भाग खड़ी होगी दूरआँख बंद होने पर दिखेगी सिर्फ भीड़,बाहें पसारते ही सिमट जायेगा तुम्हारा पौरुष,तब, झांकना अपने भीतरएक लौ जलती मिलेगीवंही;जंहा, जमा क...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
5

अटल जी की अवधी बोली में लिखी कविता

मनाली मत जइयोमनाली मत जइयो, गोरी राजा के राज मेंजइयो तो जइयो, उड़िके मत जइयो, अधर में लटकीहौ, वायुदूत के जहाज़ में.जइयो तो जइयो, सन्देसा न पइयो, टेलिफोन बिगड़े हैं, मिर्धा महाराज मे...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
8

बस एक ख़्वाब था छू ले कोई!

बस एक ख़्वाब था छू ले कोई ,सहला दे ज़रा इन ज़ख्मों कोइक लम्हा अपना दे जाये औरबाँट ले मेरे अफ़सानों को।कुछ नाज़ुक शब्द पिरोकर केएक हार मुझे पहना जाएँ,कुछ सच्ची -मुच्ची बातों से वो मेरा दिल बहला जाएँ...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
7

कारोबार

जब तुम अट्टालिकाओं की खेती कर रहे थे,तभी तुमने तबाह कर दिया था बूढ़े बरगद का साम्राज्यपीपल की जमीन को गिरवीं रख दिया था,न जाने कितने पेड़ों को किया था धराशायी,अपनी रौ में ख़त्म कर रहे थे अपने ही बच...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
9

स्वाद!

उनकी टपकती खुशी मेंछल की बारिश ज़्यादा है,आँखों में रौशनी से ज्यादा है नमी,धानी चूनरों में बंधे पड़े हैं कई प्रेम,ऊब की काई पर तैरती है ज़िंदगी की फसलगुमनाम इश्क़ की रवायत में,जल रही हैं उंगलियां,ज...  और पढ़ें
6 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
9

एक सज़ायाफ्ता प्रेमी

प्रेम करते हुएअचानक ही वो मूँद लेता है अपनी आँखेंऔर सिसकता है बेआवाज़,हमारे प्रगाढ़ आलिंगन से दूर होता हुआनज़रें चुराता है,बोलने की कोशिश में,साथ नहीं देते होंठ,बस लरज़ जाती है थोड़ी सी गर्दन,मेरे ...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
18

कविताओं की खेती

आँगन भर भर संजोती हूँ कवितायेँ,उनके शब्दों में खेल लेती हूँ ताल-तलैया,कभी कभी चाय के कप में उड़ेल कवितायेँचुस्कियां लेती हूँ उनके भावों की,कवितायेँ भी... पीछा ही नहीं छोड़ती,धमक पड़ती हैं कभी भीमा...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
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8

सूखे मेघ

7 माह पूर्व
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10

कबीर

7 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
6

उम्र का नृत्य

उम्र चेहरे पर दिखाती है करतब,उठ -उठ जाता है झुर्रियों का घूंघट,बेहिसाब सपनों की लाश अब तैरती है आँखों की सतह पर,कुछ झूठी उम्मीदें अब भी बैठी हैं,आंखों के नीचे फूले हुए गुब्बारों पर,याद आते हैं ...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
9

आँचल में सीप

तुम्हारी सीप सी आंखेंऔर ये अश्क के मोती,बाख़बर हैं इश्क़ की रवायत से...तलब थी एक अनछुए पल कीजानमाज बिछी;ख़ुदा से वास्ता बनातुम्हारी पलकों ने करवट लीदुआ में हाँथ उठा बीज ने कुछ माँग लियामेघ बरसे,&n...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
11

मौत का सौदा

हाशिये पर खड़े लोग, प्रतीक्षारत हैं अपनी बारी की,उनकी आवाज़ में दम है,सही मंतव्य के साथ मांगते हैं अपना हक़,कर्ज के नाम पर बंट रही मौत को लगाते हैं गले,अपनी ही ज़मीन पर रौंद दिये जाते हैं;कर्ज लेक...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
20

आदमी होने का मतलब

मैं एक आदमी हूँ मौत से भागता हुआ भरमाता हुआ ख़ुद को कि मौत कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी मेरा....मैं एक कसाई हूँ,मौत का रोज़गार करता हुआ ज़िंदा हूँ अपनी संवेदनाओं समेतकटे हुए जानवरों की अस्थियों मे...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
16

देख कर भी जो नहीं देखा !

एक कविता.... कुछ अदेखा सा जो यूं ही गुज़र जाता है व्यस्त लम्हों के गुजरने के साथ और हम देखकर भी नहीं देख पाते , न उसका सौंदर्य , न उसकी पीड़ा, न ख़ामोशी , और न ही संवेग सब कुछ किसी मशीन से निकलते उत्पाद क...  और पढ़ें
8 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
12

कहो कालिदास , सुनें मेरी आवाज़ में

विद्वता के बोझ तले दबे हर पुरुष को समर्पित यह कविता मेरी आवाज़ में सुनें...यह कविता आप इससे पूर्व वाली पोस्ट में पढ़ भी सकते हैं......  और पढ़ें
8 माह पूर्व
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14

दहलीज़ पर कालिदास

कहो कालिदास,आज दिन भर क्या किया,धूप में खड़े खड़े पीले तो नहीं पड़े,गंगा यमुना बहती रही स्वेद कीऔर तुम.... उफ़ भी  नहीं करते ,कहो कालिदास,कैसा लगा मालविका की नज़रों से विलग होकर,तुम लौट-लौट कर आते रहे उ...  और पढ़ें
8 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
11

एक चिड़िया का घर

एक चिड़िया उड़ती हैबादलों के उस पार..उसकी चूं-चूं सुन,जागता है सूरज,उसके पंखों से छन कर, आती है ठंढी हवा, गुनगुनाती है जब चिड़िया,आसमान तारों से भर जाता है,धरती से उठने वाली; साजिशों की हुंकार स...  और पढ़ें
8 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
11

ये सरकारी कार्यालय है!

अजी ये भी कोई वक़्त है,दिन के बारह ही तो बजे हैं,अभी-अभी तो कार्यालय सजे हैं,साहब घर से निकल गए है,कार्यालय नहीं आये तो कंहा गए हैं,ज़रा चाय-पानी लाओ,गले को तर करवाओ,सरकारी कार्यालय है,भीड़ लगना आम है,...  और पढ़ें
8 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
9

नया इतिहास

मेरी जेबों में तुम्हारा इतिहास पड़ा है कितना बेतरतीब था; तुम्हारा भूत..... वक्त की नब्ज़ पर हाँथ रख,पकड़ न पाया समाज का मर्ज़,मुगालते में ही रहा; कि... वक्त मेरी मुट्ठी में है,कानों में तेल डाल, सुनता र...  और पढ़ें
8 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
12

माँ बनना.... न बनना

लेबर रूम के बेड पर तड़पती हुई स्त्री जब देती है जन्म एक और जीव को तब वह मरकर एक बार फिर जन्म लेती हैअपने ही तन में,अपने ही मन में,उसके अंतस में अचानक बहती है एक कोमल नदीजिसे वह समझती है धीरे धीर...  और पढ़ें
8 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
11

मैंने देखा है.... कई बार देखा है

मैंने देखा है,कई बार देखा है,उम्र को छला जाते हुए,बुझते हुए चराग में रौशनी बढ़ते हुए,बूढ़ी आँखों में बचपन को उगते हुएमैंने देखा है...कई बार देखा है,मैंने देखा है बूँद को बादल बनते हुए,गाते हुए लोर...  और पढ़ें
8 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
9

घूँट--घूँट प्यास

( नोट- कविता में बेवा के घर को सिर्फ एक प्रतीक के तौर पर) पढ़ें।...  और पढ़ें
9 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
19

इंतज़ार एक किताब का!

उसने मुझे बड़ी हसरत से उठाया था,सहलाया था मेरा अक्स,स्नेह से देखा था ऊपर से नीचे तक, आगे से पीछे तक,होंठों के पास ले जाकरहौले से चूम लिया था मुझे और.... बेसाख्ता नज़रें घुमाई थीं चारों ओरकि...... किस...  और पढ़ें
9 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
10

हिंदी कविता - दुनिया का सच

मेरी कविता 'दुनिया का सच'सुनें मेरी आवाज़ में जो की सामाजिक बाज़ार में स्त्री की व्यथा से आपको रूबरू करवाती है।आपकी प्रतिक्रियाएं मेरे लिए अमूल्य हैं कृपया अपनी प्रतिक्रियाएं अवश्य दें ताकि...  और पढ़ें
9 माह पूर्व
Bol Skhee Re ( साहित्यिक सरोकारों से प्रतिबद्ध )
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