hindisahityamanjari की पोस्ट्स

संदेसो दैवकी सों कहियौ

संदेसो दैवकी सों कहियौ।`हौं तौ धाय तिहारे सुत की, मया करति नित रहियौ॥जदपि टेव जानति तुम उनकी, तऊ मोहिं कहि आवे।प्रातहिं उठत तुम्हारे कान्हहिं माखन-रोटी भावै॥तेल उबटनों अरु तातो जल देखत हीं भ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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फिर फिर कहा सिखावत बात

फिर फिर कहा सिखावत बात।प्रात काल उठि देखत ऊधो, घर घर माखन खात॥जाकी बात कहत हौ हम सों, सो है हम तैं दूरि।इहं हैं निकट जसोदानन्दन प्रान-सजीवनि भूरि॥बालक संग लियें दधि चोरत, खात खवावत डोलत।सूर, सी...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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खेलत नंद-आंगन गोविन्द

खेलत नंद-आंगन गोविन्द।निरखि निरखि जसुमति सुख पावति बदन मनोहर चंद॥कटि किंकिनी, कंठमनि की द्युति, लट मुकुता भरि माल।परम सुदेस कंठ के हरि नख, बिच बिच बज्र प्रवाल॥करनि पहुंचियां, पग पैजनिया, रज-र...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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रे मन, राम सों करि हेत

रे मन, राम सों करि हेत।हरिभजन की बारि करिलै, उबरै तेरो खेत॥मन सुवा, तन पींजरा, तिहि मांझ राखौ चेत।काल फिरत बिलार तनु धरि, अब धरी तिहिं लेत॥सकल विषय-विकार तजि तू उतरि सागर-सेत।सूर, भजु गोविन्द-गु...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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ऐसैं मोहिं और कौन पहिंचानै

ऐसैं मोहिं और कौन पहिंचानै।सुनि री सुंदरि, दीनबंधु बिनु कौन मिताई मानै॥कहं हौं कृपन कुचील कुदरसन, कहं जदुनाथ गुसाईं।भैंट्यौ हृदय लगाइ प्रेम सों उठि अग्रज की नाईं॥निज आसन बैठारि परम रुचि, नि...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी

ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥उज्ज्वल पंख दिये बगुला को कोयल केहि गुन कारी॥सुन्दर नयन मृगा को दीन्हे बन-बन फिरत उजारी॥मूरख-मूरख राजे कीन्हे पंडित फि...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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सरन गये को को न उबार्‌यो

सरन गये को को न उबार्‌यौ।जब जब भीर परीं संतति पै, चक्र सुदरसन तहां संभार्‌यौ।महाप्रसाद भयौ अंबरीष कों, दुरवासा को क्रोध निवार्‌यो॥ग्वालिन हैत धर्‌यौ गोवर्धन, प्रगट इन्द्र कौ गर्व प्रहार्‌य...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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व्रजमंडल आनंद भयो

व्रजमंडल आनंद भयो प्रगटे श्री मोहन लाल।ब्रज सुंदरि चलि भेंट लें हाथन कंचन थार॥जाय जुरि नंदराय के बंदनवार बंधाय।कुंकुम के दिये साथीये सो हरि मंगल गाय॥कान्ह कुंवर देखन चले हरखित होत अपार।दे...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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रानी तेरो चिरजीयो गोपाल

रानी तेरो चिरजीयो गोपाल ।बेगिबडो बढि होय विरध लट, महरि मनोहर बाल॥उपजि पर्यो यह कूंखि भाग्य बल, समुद्र सीप जैसे लाल।सब गोकुल के प्राण जीवन धन, बैरिन के उरसाल॥सूर कितो जिय सुख पावत हैं, निरखत श्...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।जैसे उड़ि जहाज़ की पंछी, फिरि जहाज़ पै आवै॥कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करी...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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कहां लौं बरनौं सुंदरताई

कहां लौं बरनौं सुंदरताई।खेलत कुंवर कनक-आंगन मैं नैन निरखि छबि पाई॥कुलही लसति सिर स्याम सुंदर कैं बहु बिधि सुरंग बनाई।मानौ नव धन ऊपर राजत मघवा धनुष चढ़ाई॥अति सुदेस मन हरत कुटिल कच मोहन मुख बग...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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सोइ रसना जो हरिगुन गावै

सोइ रसना जो हरिगुन गावै।नैननि की छवि यहै चतुरता जो मुकुंद मकरंद हिं धावै॥निर्मल चित तौ सोई सांचो कृष्ण बिना जिहिं और न भावै।स्रवननि की जु यहै अधिकाई, सुनि हरि कथा सुधारस प्यावै॥कर तैई जै स्य...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान

तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान।छूटि गये कैसे जन जीवै, ज्यौं प्रानी बिनु प्रान॥जैसे नाद-मगन बन सारंग, बधै बधिक तनु बान।ज्यौं चितवै ससि ओर चकोरी, देखत हीं सुख मान॥जैसे कमल होत परिफुल्लत, देखत प्रि...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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बदन मनोहर गात

बदन मनोहर गातसखी री कौन तुम्हारे जात।राजिव नैन धनुष कर लीन्हे बदन मनोहर गात॥लज्जित होहिं पुरबधू पूछैं अंग अंग मुसकात।अति मृदु चरन पंथ बन बिहरत सुनियत अद्भुत बात॥सुंदर तन सुकुमार दोउ जन सूर...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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निरगुन कौन देश कौ बासी

निरगुन कौन देश कौ बासी।मधुकर, कहि समुझाइ, सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी।कैसो बरन, भेष है कैसो, केहि रस में अभिलाषी॥पावैगो पुनि कियो आपुनो जो रे कहैगो गांस...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै।यह ब्योपार तिहारो ऊधौ, ऐसोई फिरि जैहै॥यह जापै लै आये हौ मधुकर, ताके उर न समैहै।दाख छांडि कैं कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै॥मूरी के पातन के केना को मुकताहल दैहै।सूरदास, प...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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जसुमति दौरि लिये हरि कनियां

जसुमति दौरि लिये हरि कनियां।आजु गयौ मेरौ गाय चरावन, हौं बलि जाउं निछनियां॥मो कारन कचू आन्यौ नाहीं बन फल तोरि नन्हैया।तुमहिं मिलैं मैं अति सुख पायौ,मेरे कुंवर कन्हैया॥कछुक खाहु जो भावै मोहन. ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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प्रीति करि काहु सुख न लह्यो

प्रीति करि काहु सुख न लह्यो।प्रीति पतंग करी दीपक सों, आपै प्रान दह्यो॥अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों, संपति हाथ गह्यो।सारँग प्रीति करी जो नाद सों, सन्मुख बान सह्यो॥हम जो प्रीति करि माधव सों, चलत ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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अबिगत गति कछु कहति न आवै

अबिगत गति कछु कहति न आवै।ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन च...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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सबसे ऊँची प्रेम सगाई

सबसे ऊँची प्रेम सगाई।दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर पाई॥जूठे फल सबरी के खाये बहुबिधि प्रेम लगाई॥प्रेम के बस नृप सेवा कीनी आप बने हरि नाई॥राजसुयज्ञ युधिष्ठिर कीनो तामैं जूठ उठाई॥प्रे...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे।जैसे उड़ि जहाज की पंछि, फिरि जहाज पर आवै॥कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।परम गंग को छाँड़ि पियसो, दुरमति कूप खनावै॥जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल खा...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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पिया बिन

पिया बिन नागिन काली रात ।कबहुँ यामिन होत जुन्हैया, डस उलटी ह्वै जात ॥यंत्र न फुरत मंत्र नहिं लागत, आयु सिरानी जात ।'सूर'श्याम बिन बिकल बिरहिनी, मुर-मुर लहरें खात ॥- सूरदास...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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प्रीति करि काहु सुख न लह्यो

प्रीति करि काहु सुख न लह्यो।प्रीति पतंग करी दीपक सों, आपै प्रान दह्यो॥अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों, संपति हाथ गह्यो।सारँग प्रीति करी जो नाद सों, सन्मुख बान सह्यो॥हम जो प्रीति करि माधव सों, चलत ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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निसिदिन बरसत नैन हमारे।

निसिदिन बरसत नैन हमारे।सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जबते स्याम सिधारे।।अंजन थिर न रहत अँखियन में, कर कपोल भये कारे।कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहुँ, उर बिच बहत पनारे॥आँसू सलिल भये पग थाके, बहे जात सित तारे...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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सखी, इन नैनन तें घन हारे

सखी, इन नैनन तें घन हारे ।बिन ही रितु बरसत निसि बासर, सदा मलिन दोउ तारे ॥ऊरध स्वाँस समीर तेज अति, सुख अनेक द्रुम डारे ।दिसिन्ह सदन करि बसे बचन-खग, दुख पावस के मारे ॥सुमिरि-सुमिरि गरजत जल छाँड़त, अं...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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है हरि नाम कौ आधार

है हरि नाम कौ आधार।और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार।सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौई घृत-सार॥दसहुं दिसि गुन कर्म रोक्यौ मीन कों ज्यों जार।सूर, हरि कौ ...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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