दुनियादारी की पोस्ट्स

मेरा बचपननामा

बचपनपर कायम तमाम परिभाषाओं से इतर एक ही परिभाषा सटीक बैठती है : बेफिक्री में जो बीत गया वो बचपन ही था।तो पियारे अपना बचपन भी कुछ ऐसी ही बेफिक्री में बीता। हालांकि ये बेफिक्री आज तलक कायम है पर उ...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
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नानी का घर

गर्मियोंकी छुट्टियों में नानी के घर जाने का मौका सालभर इंतजार के बाद आता था। स्कूल बंद होते ही मम्मी-पापा से नानी के घर जाने की जिद सबसे खास फरमाइश रहती थी। फिर, महीना भर नानी के घर ही कटता। जबक...  और पढ़ें
5 माह पूर्व
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आखिर भुगतना तो बच्चों को ही है

जिम्मेदारशिक्षा के प्रति कितने सजग हैं इसका पता सीबीएसई के दो पर्चों- 10वीं के गणित और 12वीं के अर्थशास्त्र- के लीक होने से ही चलता है। उनकी नाक के नीचे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ का खेल चलता ...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
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हिंसा अंतिम विकल्प नहीं

एकसभ्य समाज में हिंसा की कोई जगह नहीं होती। न ही हिंसा के दम पर किसी भी मुद्दे को सुलझाया जा सकता है। असहमति या नाराजगी का यह मतलब कतई नहीं हो जाता कि आप उक्त मुद्दे के खिलाफ आगजनी या अराजकता पर ...  और पढ़ें
7 माह पूर्व
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फेक न्यूज का कारोबार

सोशलमीडिया तरह-तरह की खबरों-सूचनाओं का भंडार है। यहां यह यकीन कर पाना जरा मुश्किल है कि कौन-सी खबर सही और कौन-सी फर्जी (फेक) है। फिर भी, सही और फर्जी (फेक) खबरों के कारोबार का हम किसी न किसी स्तर पर ...  और पढ़ें
8 माह पूर्व
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फेसबुक के अपने कुछ अनुभव

फेसबुकपर रहने के अपने फायदे-नुकसान हैं। पर, फेसबुक पर न रहने के भी अपने फायदे-नुकसान हैं। तकरीबन दो साल फेसबुक से दूरी बनाकर यह मैंने करीब से महसूस किया है। बताता हूं...।दो साल में मैंने फेसबुक ...  और पढ़ें
11 माह पूर्व
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समाज, रिश्ते और हम

क्यासमाज खुद से हार चुका है? क्या समाज के सुधरने की उम्मीद खत्म हो चुकी है? अक्सर ऐसे प्रश्न हमारे सामने मुंह खोले खड़े रहते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर या तो हमारे पास होते नहीं या फिर हम खुद को इन...  और पढ़ें
11 माह पूर्व
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बूस्टर पर टिकी अर्थव्यवस्था!

इसेसमय के साथ समझौता कह लीजिए या कुछ और मगर अब हमें गलत दिशा में चलना भाने-सा लगा है। हम अपनी चाल के शहंशाह बने रहना चाहते हैं। विडंबना यह है कि हमें हमारी गलत चाल के लिए अगर कोई टोकता भी है तो उस...  और पढ़ें
11 माह पूर्व
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हवा में उड़ते संकल्प

हररोज हम कितनी तरह के संकल्प लेते हैं, इस बारे में शायद ठीक से हमें भी नहीं पता होगा! किसी मुद्दे पर जब सब संकल्प ले रहे होते हैं तो फॉर्मिल्टी निभाने के लिए हम भी लाइन में लग जाते हैं। अखबारों मे...  और पढ़ें
11 माह पूर्व
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मुद्दों से भटकतीं सोशल मीडिया पर बहसें

सोशल मीडियाके खेल निराले हैं। यहां कब कौन-सा मुद्दा गेंद की तरह हवा में उछलकर वायरल हो जाए कोई नहीं जानता। वायरल होते ही उस मुद्दे को सोशल मीडिया पर तब तक भुनाया जाता है जब तक उसकी आत्मा सड़-गल न...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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असहमति के स्वर का कुचला जाना

गौरी लंकेश...!‘असहमति’ के एक और स्वर को ‘निर्ममता’ से कुचल दिया गया। सत्ता के खिलाफ जाने और लिखने का ‘हश्र’ गौरी लंकेश को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। यों तो हम एक बहुत बड़े लोकतांत्रिक मुल्क हैं-...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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हिन्दी की चिंता!

इसेविडंबना नहीं दोगलापन ही कहा जाएगा कि हम हिंदी की चिंता के लिए 'हिंदी दिवस'को चुनते हैं। पूरे साल इस बात से हमें कोई मतलब नहीं रहता कि हिंदी में क्या खास हो रहा है? हिंदी का विस्तार कितना और कह...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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वहशी होते समाज के बीच मासूम बच्चे

समाजको हम किस ओर लिए जा रहे हैं यह हमें भी नहीं मालूम। बस चले जा रहे हैं। एक होड़ या कहूं एक जिद-सी है हमारे भीतर एक-दूसरे को ‘मात’ दे आगे निकल जाने की। आगे निकल जाने की यह घुड़-दौड़ हमसे कितना कुछ ...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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अंधविश्वासों की चोटियां

चोटियांकाटी जा रही हैं। कौन काट रहा है? क्यों काट रहा है? किस उद्देश्य के लिए काट रहा है? इन प्रश्नों के जवाब किसी के पास नहीं। फिर भी, खबरें निरंतर चोटियां काटे जाने की आ रही हैं।समाज में जितने म...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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हमला

उस रोजएक और आतंकी हमला हुआफिर कुछ जानेंअपनी जानों से हाथ धो बैठींखबर पाते ही सोशल मीडियाके भद्र (वीर) लोग अपने-अपने फेसबुक-टि्वटर के पेजों-पोस्टों परतरह-तरह की लानतें भेजने में जुट गएकिसी ने स...  और पढ़ें
1 वर्ष पूर्व
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व्यंग्य पर दंगल

आभासी दुनियामें व्यंग्य पर ‘दंगल’ जारी है। फेसबुक अखाड़ा है। व्यंग्य का हर तगड़ा और दियासलाई पहलवान अखाड़े में उतर आया है एक-दूसरे से ‘मुचैटा’ लेने को। दोनों तरफ के पहलवान अपने-अपने दांव चलत...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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खुशहाली पर ग्रहण

इसपर यकीन करने के लिए कि ‘भारत कम खुशहाल देश है’ दिमाग पर अतिरिक्त लोड डालने की जरूरत नहीं। हालिया सर्वे ने इस बात की साफ पुष्टि कर दी है। जिक्र तो हालांकि हर किताब और ग्रंथ में यही मिलता है कि ...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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सोशल मीडिया पर विरोध के बहाने

विरोधअब ‘जमीन’ पर कम, ‘सोशल मीडिया’ पर अधिक नजर आता है। एक तरह से- विरोध के नाम पर- यहां आपस में ‘ज़बानी दंगल’ छिड़ा ही रहता है। विरोध के बीच विचारधाराएं कोई जगह नहीं रखतीं। या यों कहिए कि सोशल म...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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आइए, नोटबंदी के बहाने विरोध-विरोध खेलें

जबलोगों के पास करने को कुछ खास नहीं होता, तब वे विरोध-प्रदर्शन करते हैं। खूब, खूब, खूब विरोध करते हैं। सड़क से लेकर संसद तक विरोध की नदियां बहा देते हैं। विरोध की उस नदी में न जाने कितने चले आते ह...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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फिदेल कास्त्रो और कॉमरेडो के आंसू

विश्वके बड़े क्रांतिकारी कम्यूनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो नहीं रहे। 90 साल की लंबी पार खेलकर अंततः उन्होंने दुनिया को ‘अलविदा’ बोल दिया। कास्त्रो के न रहने पर क्यूबा और उसके नागरिकों के गम का ...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
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पानी पर हाहाकार

फिलहाल, पानी के मसले ने हमें पानी-पानी कर रखा है। आकाश से लेकर पताल तक पानी के लिए 'हाहाकार'मचा है। आलम यह है कि एक दिन पानी मिलने के बाद अगले दिन मिलेगा या नहीं; कुछ नहीं पता। लंबी-लंबी लाइनों में ...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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शहर भीतर शहर

कभी-कभीमुझे अपना ही शहर 'अनजाना'-सा लगता है। मेरा शहर अब पहले जैसा 'छोटा'नहीं रहा। बढ़ गया है। निरंतर बढ़ता ही चला जा रहा है। एक ही शहर के लोग पुराने शहर को छोड़कर नए शहर में बसने को उतावले हुए बैठ...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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कन्हैया के नाम खत

प्यारे कन्हैया,फिलहाल, अंतरिम जमानत पर जेल की सलाखों से बाहर आने की तुम्हें बधाई। हालांकि बधाई देने के लायक तो नहीं तुम फिर भी इसलिए दे रहा हूं, शायद तुम्हारे दिमाग पर पड़ा 'अतिवाद'का जाला हट जा...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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ये कहां आ गए हम

क्या ऐसानहीं लगता आपको कि बदलते समय के साथ हम और भी असंवेदनशील और आराजक हो गए हैं? हमारे भीतर से- गैरों की जाने दीजिए- अपनी ही आलोचना को सुनने का 'साहस'नहीं बचा अब। हर ऐरी-गैरी बातों-मुद्दों पर आप...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
दुनियादारी
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मजाक पर पहरा

यों भीहमारे बीच से हास्य और हंसी-मजाक निरंतर कम होता जा रहा है, ऐसे में एक कलाकार को एक बाबा की कथित मिमिक्री करने के आरोप में धर लेना, कोई हैरत का विषय नहीं। मिमिक्री या मजाक को ही अगर व्यक्तिगत ...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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मोबाइल फोन की बैट्री

काफी देरसे मैं उन्हें देख रहा था। वे अत्यंत चिंतित मुद्रा में थे। कभी दाएं टहल लगाते, तो कभी बाएं। कभी दोनों हाथ सिर पर रखकर मन ही मन बुदबुदाते- 'हाय! अब क्या होगा। ये बहुत गलत हुआ।'उनके इस अजीबो-...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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