* जयंत चौधरी - मृत्युंजय * की पोस्ट्स

पूरबाई की एक नई दिशा है...

पुरबाई में एक नई दिशा है,जीवन की एक नई दशा है.. चीर निराशा, फिर बहे उमंग,दिल की धड़कन, जैसे जल तरंग... पल पल महका लहका है,जीवन भी चहका चहका है...है मस्त पवन या मेरा मन,ये दृष्टि अपार जैसे नील गगन...क्यो...  और पढ़ें
1 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
11

आओ, कुछ नया करें.....

आओ, कुछ नया करें,जीवन की किताब फिर पढ़ें,खोलें वो अद्भुत से पन्ने,जिनमें लिखे सुनहरे सपने,कुछ खट्टे से दिन, मीठी रातें,सच्चे रिश्तों के पल, प्यारी बातें,मुहल्ले के मित्र, कक्षा के यार,नहीं खिंचत...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
6

संदूक में बंद थे कुछ टुकड़े.....

संदूक में बंद थे कुछ टुकड़े,कुछ गलते पिघलते से,समय की गर्मी से,और बचे हुए कुछ टुकड़े,उस संदूक को बंद कर रहे थे,बड़ी संजीदिगी से,और पलट रहेथे,कुछ अध्याय उसके अस्तित्व के,आगे की कहानी से अनभिज्ञ स...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
8

न विजय की चाह, न पराजय का डाह...

न कोई आस,न कोई प्यास,मात्र, जीवन जीने की अमिट अभिलास। न रातों के अँधेरे,न सुबह के उजाले,मात्र, अस्तित्व के होने का अहसास।न रंगों की बरसात,न मरू का पाश,मात्र, अपने कर्तव्यों का भास। न विजय की च...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
3

समर, अभी समर शेष है...।

समर, अभी समर शेष है...चीथडों में भटका, कैसा ये वेष है???समर अभी समर शेष है...हैं भेड़ सभी तेरे आसपास,जीवन में बस सुख की तलाश,अब रस्सी से बँधी है बेबसता,उठ जाग लगा हुंकार दिखा,सिंह भाल पर आज बिखरे केश है...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
4

चन्दा भी तुम, तुम ही किरन.....

चन्दा हो तुम्हीं, और तुम किरन,तुम हो धरती, तुम ही गगन...साँसे हो तुम्हीं, और तुम ही पवन,बगिया भी तुम, और तुम्हीं सावन...तुम संग है लौ, और तू ही रोशन,तुम से ही तपन, और तुम ही चंदन...पर्वत हो तुम्हीं, और तुम ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
3

मुस्कानों में चमक....

कुछ बात नयी है फ़िज़ाओं में,जैसे घुलता हो रंग हवाओं में... मुस्कानों में चमक, अक्सर है,जैसे चंदा के संग का असर है... मन मंदिर तक रश्मि फैली,कोने कोने किरण उजली उजली...  है आस किरण चमकी चमकी,उमंगें ...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
1

एक, उद्यान मधुर...

बनगयाहूँएक, उद्यानमधुर,आकरदेखो, मेरेअंतरमन...मुखड़ेपरफैलीयेमुस्कान,इसकीहैमदमस्तसुगंध...औरहँसीकीहरएकगूँज,इसउपवनकीहैजलतरंग...इसकीबेलाओंसाइठलाए,लहराएझूमेंमेरातनमन...गुनगुनाहटमेरेअधरों...  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
2

ऐ माँ अपनी गोदी में.... फिर एक बार बुला लेना...

ऐ माँ, अपनीगोदीमें, फिरएकबारबुलालेना...हैआसअधूरीएकबची,तेरेचरणोंमेंमस्तकदेना...चाहेकितनाभीमुश्किलहो.इसपापीकोक्षमाकरना...अवसरदेनाएकबारमुझे,तेरेक़दमोंकीसेवाकरना....कैसीभक्तिहै, हेमाते,...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
4

क्रान्ति का मृदंग..

दासता की बेड़ियाँ कटी नहीं,बजने दो क्रान्ति का मृदंग..जलते सूरज की नयी किरण,हे वीर उठो क्रांति के संग...साहस का साथ ना छोड़ो तुम,रंग लो तन मन, केसरिया रंग...क्यों हाथों में मुँह डाल रखा,क्यों अस्त्...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
3

संघर्ष अमर हो जाता है...

परिणामों की चिंता किसे?संघर्ष अमर हो जाता है... कभी विजयी होने वाला,कभी बलिदानी हो जाता है.... गर न हो मनवांछित अंत,तो भी वो अनंत हो जाता है.... जो तन, मन, प्राण, और हर कण,हर क्षण, साहस से रण कर जाता ह...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
2

मेरा वैरागी पागल मन..

मेरा वैरागी पागल मन,कब बात समझ ये पाएगा,जो मेरा ना था, ना हो पाएगा,कब तक उसपे भरमाएगा....क्यों अंतर मन के अंदर,कोई टीस सी उठती रहती है,अश्रु बहा के शांत करूँ,पर साँस सुलगती रहती है...कैसा है जाल, माया ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
2

माली, लाना हाहाकार नहीं...

पात्रगरलक्योंछलकाऊँ,येजीवनकाआधारनहीं...बगियाकोतोमहकानाहै,माली, लानाहाहाकारनहीं...हरपुष्पलताऔरहरपाती,जीवनरसप्यासेहोतेहैं...धरतीमाँ, औरआकाशपिताद्वारा,कितनीमुश्किलसेउगाएहोतेहैं...जीवन...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
3

चंदा और धरा....

कितना अद्भुत, मधुर है ये नाता....पावन सा, चंदा और धरा सा...समीप भी, और अपनी धुरी में भी..दोनों पूरक, और शक्ति एक दूजे की...कुछ प्रश्न तो हैं, विधाता की रचना पर...देखो चंदा की जरूरत, धरा से पूछकर...यूँ तो, चं...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
2

अंतर में उतर के....

अंतर में उतर के, खुद का विस्तार हुआ...जब स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार हुआ..कितना असीम मानव आत्मन है...कितना संकुचित ये पागल मन है..क्यों हम अपने पैरों को ही सलाखें बनाते हैं?क्यों अपने हाथों को नि...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
1

मेरा ये करुण क्रंदन...

केवल जाने है मेरा मन,मेरा ये करुण क्रंदन...जब से रूठे मेरे देवगन,दाहक बन गया चंदन....~ जयंत...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
1

जलता दीपक....

क्यों मैंने ऐसा काम किया,एक पाप अपने नाम किया,जो जलकर करता था रोशन मुझे,उस दीपक को ही जला दिया....~ जयंत :-(...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
1

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उलझनोंकेप्रश्नकई, उत्तरनहीं,क्याईश्वरसुलझापाएगा?यामेरेप्रश्नोंमेंखोकरवोभी,ख़ुदएकप्रश्नबनजाएगा?~ जयंत ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
2

क्या है रण ?

क्या मात्र धरा पर होता है रण?या चलता ये मन में हर क्षण?क्या योद्धा लड़ते मात्र रिपुदल से?या, मन की शंका और दलदल से?क्या मात्र भुजाएं वीरों का बल हैं?या, अमिट आशाएँ संबल हैं?जब साहस भर जाए कण कण, तो ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
1

पूरबाई में नयी दिशा है...

पुरबाई में एक नई दिशा है,जीवन की एक नई दशा है.. चीर निराशा, फिर बहे उमंग,दिल की धड़कन, जैसे जल तरंग... पल पल महका लहका है,जीवन भी चहका चहका है...है मस्त पवन या मेरा मन,ये दृष्टि अपार जैसे नील गगन...क्यो...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
0

तुझे मन मीत लिखूँ कैसे...

मैं ऐसा गीत लिखूँ कैसे,तुझे मन मीत लिखूँ कैसे,तू चाँद गगन का रोशन रोशन,मैं धरा पे बंजारा जैसे,तू जीवन की पावन सरिता,मैं ठहरा सा किनारा जैसे,तू वृक...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
2

आ के देखो इन नयनों में.... एक बार ...

आकेदेखोइननयनोंमें,प्रतीक्षातेरीकबसेहैइन्हें,गहराईमें, आँसुओंसेपरे, एकऔरसंसारमिलेगातुम्हें,आशाकेपंछियोंसेभरा, एकआसमानदिखेगातुम्हें,हाँमिलेंगेकुछटूटेपरभी,पर, हरपरिंदाउड़तामिल...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
1

ये नयन...

येगहरे नयन,हैं आत्मिक दर्पन,अंतरमरुभूमि,येगहरासावन,जगअंधियारा,येचन्दारोशन,जीवनतपन,येमधुरचंदन,मनबंजारा,ये उन्मुक्त गगन,उल्लास पतंग,येमस्तपवन,चहुँ कड़वाहट,येमिश्री पावन,येगहरे, नय...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
1

ये वसुंधरा है मेरी.... (मेरी शक्ति को समर्पित)

आज हूँ जरा जरा,जोश में भरा भरा,ललकार दूँ आज मैं, मेरी है ये, वसुंधरा,क्यों आस पास जाल है,क्यों उठ रही ये ढाल है,तलवार है कहाँ गिरी,क्यों झुक रहा ये भाल है?घुटने नहीं टिकेंगे ये,वीर की ललकार है,साहस ...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
* जयंत चौधरी - मृत्युंजय *
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