डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
"धरा के रंग" की पोस्ट्स

"अन्तर्राष्ट्रीय महिलादिवस-मैं नारी हूँ...!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नारी की व्यथामैंधरती माँ की बेटी हूँइसीलिए तोसीता जैसी हूँमैं हूँकान्हा के अधरों सेगाने वाली मुरलिया,इसीलिए तोगीता जैसी हूँ।मैंमन्दालसा हूँ,जीजाबाई हूँमैंपन्ना हूँ,मीराबाई हूँ।जी हाँमै...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
96

"नये साल का सूरज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

मैं नये साल का सूरज हूँ,हरने आया हूँ अँधियारा। मैं स्वर्णरश्मियों से अपनी,लेकर आऊँगा उजियारा।।चन्दा को दूँगा मैं प्रकाश,सुमनों को दूँगा मैं सुवास,मैं रोज गगन में चमकूँगा,मैं सदा रहूँगा आस...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
105

"नमन और प्रणाम..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सूर, कबीर, तुलसी, के गीत,सभी में निहित है प्रीत।आजलिखे जा रहे हैं अगीत,अतुकान्तसुगीत, कुगीतऔर नवगीत।जी हाँ!हम आ गये हैंनयी सभ्यता में,जीवन कट रहा हैव्यस्तता में।सूर, कबीर, तुलसी कीनही थी कोई ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
119

‘‘आशा के दीप जलाओ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जलने को परवाने आतुर, आशा के दीप जलाओ तो। कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।। मधुवन में महक समाई है, कलियों में यौवन सा छाया, मस्ती में दीवाना होकर, भँवरा उपवन में मँडराया, वह झ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
126

"बादल का चित्रगीत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" सेएक गीतबादल का चित्रगीतकहीं-कहीं छितराये बादल,कहीं-कहीं गहराये बादल।काले बादल, गोरे बादल,अम्बर में मँडराये बादल। उमड़-घुमड़कर, शोर मचाकर,कहीं-कहीं बौराये बा...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
189

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) "पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा"

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से एक गीतपा जाऊँ यदि प्यार तुम्हाराकंकड़ को भगवान मान लूँ, पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! काँटों को वरदान मान लूँ, पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! दुर्गम पथ, बन ज...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
124

"आज से ब्लॉगिंग बन्द" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।फेस बुक पर मेरे मित्रों में एक श्री केवलराम भी हैं। उन्होंने मुझे चैटिंग में आग्रह किया कि उन्होंने एक ब्लॉगसेतु के नाम से एग्रीगेटर बनाया है। अतः आप उसमें अपने ब्लॉग जोड़ दीजिए।&nb...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
77

"अमलतास के पीले झूमर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से एक गीत"अमलतास के पीले झूमर"तपती हुई दुपहरी में, झूमर जैसे लहराते हैं।कंचन जैसा रूप दिखाते, अमलतास भा जाते हैं।।जब सूरज झुलसाता तन को, आग बरसती है भू पर।ये छा...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
80

"मखमली लिबास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से एक गीत"मखमली लिबास" मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदम...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
87

"कठिन बुढ़ापा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से एक कविता"कठिन बुढ़ापा"बचपन बीता गयी जवानी, कठिन बुढ़ापा आया।कितना है नादान मनुज, यह चक्र समझ नही पाया।अंग शिथिल हैं, दुर्बल तन है, रसना बनी सबल है।आशाएँ और अभि...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
101

"फिर से आया मेरा बचपन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" सेएक गीत"फिर से आया मेरा बचपन"जब से उम्र हुई है पचपन। फिर से आया मेरा बचपन।। पोती-पोतों की फुलवारी, महक रही है क्यारी-क्यारी, भरा हुआ कितना अपनापन। फिर स...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
209

"शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! मनुजता ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
156

"ग़ज़ल-लगे खाने-कमाने में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छलक जाते हैं अब आँसू, ग़ज़ल को गुनगुनाने में।नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।हुए बेडौल तन, ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
102

"गीत-क्या हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज मेरे देश को क्या हो गया है?मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??पुष्प-कलिकाओं पे भँवरे, रात-दिन मँडरा रहे,बागवाँ बनकर लुटेरे, वाटिका को खा रहे,सत्य के उपदेश को क्या हो गया है?मख़मली परिवेश को...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
99

"गीत गाना जानते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"गीत गाना जानते हैं" वेदना की मेढ़ को पहचानते हैं।हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।भावनाओं पर कड़ा पहरा रहा,दुःख से नाता बहुत गहरा रहा,,मीत इनको हम स्वयं ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
106

"मोटा-झोटा कात रहा हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"मोटा-झोटा कात रहा हूँ" रुई पुरानी मुझे मिली है, मोटा-झोटा कात रहा हूँ।मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।खोटे सिक्के जमा किये थे, मी...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
100

"सिमट रही खेती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"सिमट रही खेती" सब्जी, चावल और गेँहू की, सिमट रही खेती सारी। शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।। बाग आम के-पेड़ नीम के आँगन से  कटते जाते हैं,&nbs...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
89

"विध्वंसों के बाद नया निर्माण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीतगीत "विध्वंसों के बाद नया निर्माण"पतझड़ के पश्चात वृक्ष नव पल्लव को पा जाता।विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।भीषण सर्दी, गर्मी का सन्देशा लेक...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
105

"श्वाँसों की सरगम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"श्वाँसों की सरगम"कल-कल, छल-छल करती गंगा,मस्त चाल से बहती है।श्वाँसों की सरगम की धारा,यही कहानी कहती है।।हो जाता निष्प्राण कलेवर,जब धड़कन थम जाती हैं।सड़ ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
100

"अनजाने परदेशी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"अनजाने परदेशी"वो अनजाने से परदेशी!मेरे मन को भाते हैं।भाँति-भाँति के कल्पित चेहरे,सपनों में घिर आते हैं।। पतझड़ लगता है वसन्त,वीराना भी लगता मधुबन,जब ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
81

"अरमानों की डोली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"अरमानों की डोली" अरमानों की डोली आई, जब से मेरे गाँव में।पवनबसन्ती चलकर आई, गाँव-गली हर ठाँव में।। बने हकीकत, स्वप्न सिन्दूरी, चहका है घर-आँगन भी,पूर्ण ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
100

"स्वप्न" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"स्वप्न" मन के नभ पर श्यामघटाएँ, अक्सर ही छा जाती हैं।तन्द्रिल आँखों में मधुरिम से, स्वप्न सलोने लाती हैं।।निन्दिया में आभासी दुनिया, कितनी सच्ची लगत...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
97

"सरस्वती वन्दना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से"वन्दना"रोज-रोज सपनों में आकर,छवि अपनी दिखलाती हो!शब्दों का भण्डार दिखाकर,रचनाएँ रचवाती हो!!कभी हँस पर, कभी मोर पर,जीवन के हर एक मोड़ पर,भटके राही का माता तुम,पथ प्...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
99

"सितारे टूट गये हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से"सितारे टूट गये हैं"क्यों नैन हुए हैं मौन,आया इनमें ये कौन?कि आँसू रूठ गये हैं...!सितारे टूट गये हैं....!!थीं बहकी-बहकी गलियाँ,चहकी-चहकी थीं कलियाँ,भँवरे करते थे गुंजन,...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
101

"बढ़े चलो-बढ़े चलो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" सेएक गीत♥बढ़े चलो-बढ़े चलो♥कारवाँ गुजर रहा , रास्तों को नापकर।मंजिलें बुला रहीं, बढ़े चलो-बढ़े चलो!है कठिन बहुत डगर, चलना देख-भालकर,धूप चिलचिला रही,...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
96

"उपवन लगे रिझाने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" सेएक गीत♥ उपवन लगे रिझाने ♥मौन निमन्त्रण देतीं कलियाँ, सुमन लगे मुस्काने।वासन्ती परिधान पहन कर, उपवन लगे रिझाने।।पाकर मादक गन्ध शहद लेने मधुमक्खी आई,स...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
97

♥ दिवस सुहाने आने पर ♥ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" सेएक गीत♥ दिवस सुहाने आने पर ♥अनजाने अपने हो जाते,दिवस सुहाने आने पर।सच्चे सब सपने हो जाते,दिवस सुहाने आने पर।।सूरज की क्या बात कहें,चन्दा जब आग उगलता हो,साथ छ...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
93

"आओ साथी प्यार करें..!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" सेएक गीत"आओ साथी प्यार करें..!"ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही,सिहरन बढ़ती जाए!आओ साथी प्यार करें हम,मौसम हमें बुलाए!!त्यौहारों की धूम मची है,पंछी कलरव गान सुनाते।बया-युगल ति...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
92

"पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से"पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा"कंकड़ को भगवान मान लूँ, पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! काँटों को वरदान मान लूँ, पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! दुर्गम पथ, बन जाये सरल ...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
86

"कंचन का बिछौना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" सेकंचन का बिछौनारूप धरती ने धरा कितना सलोना।बिछ गया खेतों में कंचन का बिछौना।।भार से बल खा रहीं हैं डालियाँ,शान से इठला रहीं हैं बालियाँ,छा गया चारों तरफ सोना ही ...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
"धरा के रंग"
90
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