डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
काग़ज़ की नाव की पोस्ट्स

गीत "सूरज आग उगलता जाता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सूरज आग उगलता जाता।नभ में घन का पता न पाता।१।जन-जीवन है अकुलाया सा,कोमल पौधा मुर्झाया सा,सूखा सम्बन्धों का नाता।नभ में घन का पता न पाता।२।सूख रहे हैं बाँध सरोवर,धूप निगलती आज धरोहर,रूठ गया है ...  और पढ़ें
2 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
50

गीत "अमलतास खिलता-मुस्काता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सूरज की भीषण गर्मी से,लोगो को राहत पहँचाता।।लू के गरम थपेड़े खाकर,अमलतास खिलता-मुस्काता।।डाली-डाली पर हैं पहनेझूमर से सोने के गहने,पीले फूलों के गजरों का,रूप सभी के मन को भाता।लू के गरम थपेड़...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
72

"हार नहीं मानूँगा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब तक तन में प्राण रहेगा, हार नहीं माँनूगा।कर्तव्यों के बदले में, अधिकार नहीं माँगूगा।।टिक-टिक करती घड़ी, सूर्य-चन्दा चलते रहते हैं,अपने मन की कथा-व्यथा को, कभी नहीं कहते हैं,बिना वजह मैं कभी कि...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
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72

गीत "काले दाग़ बहुत गहरे हैं" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रंग-रंगीली इस दुनिया में, झंझावात बहुत गहरे हैं।कीचड़ वाले तालाबों में, खिलते हुए कमल पसरे हैं।।पल-दो पल का होता यौवन,नहीं पता कितना है जीवन,जीवन की आपाधापी में, झंझावात बहुत उभरे हैं।कीचड़ वा...  और पढ़ें
3 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
99

"कलम के मुसाफिर कहीं सो न जाना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चमक और दमक में, कहीं खो न जाना!कलम के मुसाफिर, कहीं सो न  जाना!जलाना पड़ेगा तुझे, दीप जगमग, दिखाना पड़ेगा जगत को सही मग, तुझे सभ्यता की, अलख है जगाना!! कलम के मुसाफिर, कहीं सो न  जाना!सिक्कों ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
103

"गीत सुनाती माटी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गीत सुनाती माटी अपने, गौरव और गुमान की।दशा सुधारो अब तो लोगों, अपने हिन्दुस्तान की।।खेतों में उगता है सोना, इधर-उधर क्यों झाँक रहे?भिक्षुक बनकर हाथ पसारे, अम्बर को क्यों ताँक रहे?आज ज...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
114

“बरफी-लड्डू के चित्र देखकर, अपने मन को बहलाते हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 मधुमेह हुआ जबसे हमको, मिष्ठान नही हम खाते हैं।बरफी-लड्डू के चित्र देखकर,अपने मन को बहलाते हैं।। आलू, चावल और रसगुल्ले,खाने को मन ललचाता है,हम जीभ फिराकर होठों पर,आँखों को स्वाद चखाते हैं...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
153

"नया वर्ष स्वागत करता है पहन नया परिधान" ( डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' )

नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।सारे जग से न्यारा अपना , है गणतन्त्र महान ॥ज्ञान गंग की बहती धारा ,चन्दा , सूरज से उजियारा ।आन -बान और शान हमारी -संविधान हम सबको प्यारा ।प्रजातंत्र पर भा...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
105

"नमन शैतान करते है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।बहुत आभार है उसका, बहुत उपकार है उसका,दिया माटी के पुतले को, उसी ने प्राण प्यारा है।।बहाई ज्ञान की गंगा, मधुरता ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
125

"जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो हैं कोमल-सरल उनको मेरा नमन।जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।पेड़ अभिमान में थे अकड़ कर खड़े, एक झोंके में वो धम्म से गिर पड़े, लोच वालो का होता नही है दमन।जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।स...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
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123

"गीत-हमको याद दिलाते हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब भी सुखद-सलोने सपने,  नयनों में छा आते हैं।गाँवों के निश्छल जीवन की, हमको याद दिलाते हैं।सूरज उगने से पहले, हम लोग रोज उठ जाते थे,दिनचर्या पूरी करके हम, खेत जोतने जाते थे,हरे चने और मूँ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
81

"गजल और गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गजल और गीत क्या है,नहीं कोई जान पाया है।हृदय की बात कहने को,कलम अपना चलाया है।।मिलन की जब घड़ी होती,बिछुड़ जाने का गम होता, तभी पर्वत के सीने से,निकलता  धार बन सोता,उफनते भाव के नद को,करीने से ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
90

“सावन की ग़जल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

गन्दुमी सी पर्त ने ढक ही दिया आकाश नीला देखकर घनश्याम को होने लगा आकाश पीला छिप गया चन्दा गगन में, हो गया मज़बूर सूरज पर्वतों की गोद में से बह गया कमजोर टीला बाँटती सुख सभी को बरसात की भी...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
93

"गीत-अपना साया भी, बेगाना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वक्त सही हो तो सारा, संसार सुहाना लगता है।बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।यदि अपने घर व्यंजन हैं, तो बाहर घी की थाली है,भिक्षा भी मिलनी मुश्किल, यदि अपनी झोली खाली है,गूढ़ वचन ...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
96

“बरसता सावन सुहाना हो गया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गन्दुमी सी पर्त ने ढक ही दिया आकाश नीला देखकर घनश्याम को होने लगा आकाश पीला छिप गया चन्दा गगन में, हो गया मज़बूर सूरज पर्वतों की गोद में से बह गया कमजोर टीला बाँटती सुख सभी को बरसात की भी...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
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88

‘‘जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जो हैं कोमल-सरल उनको मेरा नमन।जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।पेड़ अभिमान में थे अकड़ कर खड़े,एक झोंके में वो धम्म से गिर पड़े,लोच वालों का होता नही है दमन।जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।सख्त चट्ट...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
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88

"आज से ब्लॉगिंग बन्द" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।फेस बुक पर मेरे मित्रों में एक श्री केवलराम भी हैं। उन्होंने मुझे चैटिंग में आग्रह किया कि उन्होंने एक ब्लॉगसेतु के नाम से एग्रीगेटर बनाया है। अतः आप उसमें अपने ब्लॉग जोड़ दीजिए।&nb...  और पढ़ें
4 वर्ष पूर्व
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91

"भजन-सिमट रही है पारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चार दिनों का ही मेला है, सारी दुनियादारी।लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।अमर समझता है अपने को, दुनिया का हर प्राणी,छल-फरेब के बोल, बोलती रहती सबकी वाणी,बिना मुहूरत निकल जायेगी इक दिन प्राण...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
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107

"खारा जल पाया सागर में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अमृत रास न आया हमको,गरल भरा हमने गागर में।कैसे प्यास बुझेगी मन की,खारा जल पाया सागर में।।कथा-कीर्तन और जागरण,रास न आये मेरे मन को।आपाधापी की झंझा में,होम कर दिया इस जीवन को।वन का पंछी डोल रहा है...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
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107

"इन्साफ की डगर पर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

इन्साफ की डगर पर, नेता नही चलेंगे।होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।दिल में घुसा हुआ है,दल-दल दलों का जमघट।संसद में फिल्म जैसा,होता है खूब झंझट।फिर रात-रात भर में, आपस में गुल खिलेंगे।ह...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
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118

"ईश्वर-अल्लाह कैद हो गया आलीशान मकानों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 भटक रहा है आज आदमी, सूखे रेगिस्तानों में।चैन-ओ-अमन, सुकून खोजता, मजहब की दूकानों में।चौकीदारों ने मालिक को, बन्धक आज बनाया है,मिथ्या आडम्बर से, भोली जनता को भरमाया है,धन के लिए समागम होते, सभा...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
102

"बाँटता ठण्डक सभी को चन्द्रमा सा रूप मेरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बाँटता ठण्डक सभी को, चन्द्रमा सा रूप मेरा।तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।रश्मियों से प्रेमियों को मैं बुलाता,चाँदनी से मैं दिलों को हूँ लुभाता,दीप सा बनकर हमेशा, रात का हरता अन्धेरा...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
87

"मकर लग्न में सूरज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

धनु से मकर लग्न में सूरज, आज धरा पर आया।गया शिशिर का समय और ठिठुरन का हुआ सफाया।।गंगा जी के तट पर, अपनी खिचड़ी खूब पकाओ,खिचड़ी खाने से पहले, निर्मल जल से तुम नहाओ,आसमान में खुली धूप को सूरज लेकर आ...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
106

"रिश्वत का चलन मिटायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अपना देश महान बनायें।आओ नूतन वर्ष मनायें।। मातम भी था और हर्ष था,मिला-जुला ही गयावर्ष था,भूल-चूक जो हमने की थीं,उन्हें न फिर से हम दुहरायें। अपना देश महान बनायें।आओ नूतन वर्ष मनायें।। कभ...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
105

"सुखनवर गीत लाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गजल और गीत क्या है,नहीं कोई जान पाया है।हृदय की बात कहने को,कलम अपना चलाया है।।मिलन की जब घड़ी होती,बिछुड़ जाने का गम होता, तभी पर्वत के सीने से,निकलता  धार बन सोता,उफनते भाव के नद को,करीने से ...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
135

"दुनियादारी जाम हो गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

नीलगगन पर कुहरा छाया, दोपहरी में शाम हो गई।शीतलता के कारण सारी, दुनियादारी जाम हो गई।।गैस जलानेवाली ग़ायब, लकड़ी गायब बाज़ारों से,कैसे जलें अलाव? यही तो पूछ रहे हैं सरकारों से,जीवन को...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
120

"जवानी गीत है अनुपम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सुलगते प्यार में, महकी हवाएँ आने वाली हैं। दिल-ए-बीमार को, देने दवाएँ आने वाली हैं।। चटककर खिल गईं कलियाँ, महक से भर गईं गलियाँ, सुमन की सूनी घाटी में, सदाएँ आने वाली है। दिल-ए-बीमार को, देने द...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
130

"चम्पू काव्य-खो गयी प्राचीनता?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कौन थे? क्या थे? कहाँ हम जा रहे?व्योम में घश्याम क्यों छाया हुआ?भूल कर तम में पुरातन डगर को,कण्टकों में फँस गये असहाय हो,वास करते थे कभी यहाँ पर करोड़ो देवता,देवताओं के नगर का नाम आर्यावर्त था,काल ...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
132

"ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मोक्ष के लक्ष को मापने के लिए,जाने कितने जनम और मरण चाहिए ।प्यार का राग आलापने के लिए,शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।लैला-मजनूँ को गुजरे जमाना हुआ,किस्सा-ए हीर-रांझा पुराना हुआ,प्रीत की पोथिय...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
काग़ज़ की नाव
135

"दोहे-कीर्तिमान सब ध्वस्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अगवाड़ा भी मस्त है, पिछवाड़ा भी मस्त।नेता जी ने कर दिये, कीर्तिमान सब ध्वस्त।१।--जोड़-तोड़ के अंक से, चलती है सरकार।मक्कारी-निर्लज्जता, नेता का श्रृंगार।२।--तन-मन में तो काम है, जिह्वा पर हरिनाम...  और पढ़ें
5 वर्ष पूर्व
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