डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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एक ग़ज़ल : वक़्त सब एक सा नहीं---

एक ग़ज़ल :वक़्त सब एक सा  नहीं होतारंज-ओ-ग़म देरपा नहीं होताआदमी है,गुनाह  लाज़िम हैआदमी तो ख़ुदा  नहीं  होताएक ही रास्ते से जाना  हैऔर फिर लौटना नहीं होताकिस ज़माने की बात करते होकौन अब बेवफ़ा न...  और पढ़ें
5 दिन पूर्व
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Laxmirangam: अतिथि अपने घर के

Laxmirangam: अतिथि अपने घर के: अतिथि अपने घर के बुजुर्ग अम्मा और बाबूजी साथ हैं,  उन्हे सेवा की जरूरत है, घर में एक कमरा उनके लिए ही है  और दूसरा हमारे पा......  और पढ़ें
2 सप्ताह पूर्व
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एक ग़ज़ल : एक समन्दर मेरे अन्दर---

एक ग़ज़ल : एक समन्दर ,मेरे अन्दर...एक  समन्दर ,  मेरे  अन्दर शोर-ए-तलातुम बाहर भीतरएक तेरा ग़म  पहले   से हीऔर ज़माने का ग़म उस परतेरे होने का ये तसव्वुरतेरे होने से है बरतर चाहे जितना दूर रहूँ&nbs...  और पढ़ें
3 सप्ताह पूर्व
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ग़ज़ल : हमें मालूम है संसद में फिर ---

ग़ज़ल  : हमें मालूम है संसद में फिर ---हमें मालूम है संसद में कल फिर क्या हुआ होगाकि हर मुद्दा सियासी ’वोट’ पर  तौला  गया होगावो,जिनके थे मकाँ वातानुकूलित संग मरमर  केहमारी झोपड़ी के  नाम हंग...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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आंसुओं को पनाह नहीं मिलती!

तोहमतें हजार मिलती हैं,नफरतें हर बार मिलती हैं,टूट कर बिखरने लगता है दिल,आंखें जार-जार रोती हैं,देख कर भी अनदेखा कर देते हैं लोग,आंसुओं को पनाह नहीं मिलती।।मुफलिसी के आलम में गुजरती जिंदगी,सपन...  और पढ़ें
4 सप्ताह पूर्व
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चन्द माहिया : क़िस्त 55

चन्द माहिया : क़िस्त 55:1:शिकवा न शिकायत हैजुल्म-ओ-सितम तेराक्या ये भी रवायत है:2:कैसा ये सितम तेरासीख रही हो क्या ?निकला ही न दम मेरा :3:छोड़ो भी गिला शिकवाअहल-ए-दुनिया सेजो होना था सो हुआ:4:इतना ही बस ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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महिमा अपरंपार है इनकी

मेरी इस रचना का उद्देश्य किसी वर्ग विशेष परआक्षेप करना नहीं है बल्कि मैं उस सत्य कोशब्द रूप में प्रकट कर रहीं हूँ जो प्रतिदिन हमारे सामने आता है।बड़ा अच्छा धंधा है, शिक्षा का न फंदा है।न ही को...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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दर्द का समंदर

जब टूटता है दिलधोखे फरेब सेअविश्वास और संदेह सेनफरतों के खेल सेतो लहराता है दर्द का समंदररह जाते हैं हतप्रभअवाक् इंसानों के रूप सेसीधी सरल निष्कपट जिन्दगीपड़ जाती असमंजस मेंबहुरूपियों की ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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एक व्यंग्य : सबूत चाहिए ---

एक लघु व्यथा : सबूत चाहिए.....[व्यंग्य]विजया दशमी पर्व शुरु हो गया । भारत में, गाँव से लेकर शहर तक ,नगर से लेकर महानगर तक पंडाल सजाए जा रहे हैं ,रामलीला खेली जा रही है । हर साल राम लीला खेली जाती है , ...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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एक ग़ज़ल : वातानुकूलित आप ने---

वातानुकूलित आप ने आश्रम बना लिएसत्ता के इर्द-गिर्द ही धूनी रमा  लिए’दिल्ली’ में बस गए हैं ’तपोवन’ को छोड़कर’साधू’ भी आजकल के मुखौटे चढ़ा लिएसब वेद ज्ञान श्लोक ॠचा मन्त्र  बेच करजो धर्म बच गय...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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विषमता जीवन की

ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं के समक्षबनी ये झुग्गियांविषमता का देती परिचयमारती हैं तमाचा समाज के मुख परचलता है यहां गरीबी का नंगा नाचभूखे पेट नंगे तनभटकता भारत का भविष्यमांगता जीवन की चंद खुशिया...  और पढ़ें
1 माह पूर्व
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एक ग़ज़ल : जड़ों तक साज़िशें---

एक ग़ज़ल : जड़ों तक साजिशें गहरी---जड़ों तक साज़िशें गहरी ,सतह पे हादसे थेजहाँ बारूद की ढेरी , वहीं  पर  घर  बने थेहवा में मुठ्ठियाँ ताने  जो सीना  ठोकते थेज़रूरत जब पड़ी उनकी ,झुका गरदन गए थेकि उनक...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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Laxmirangam: तुम फिर आ गए !!!

Laxmirangam: तुम फिर आ गए !!!: तुम फिर आ गए !!! --------------------------- बापू, तुम फिर आ गए !!! पिछली बार कितना समझाया था, पर तुम माने नहीं. कितनी ......  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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शब्द ही सत्य है

शब्द मय है सारा संसार,शब्द ही काव्य अर्थ विस्तार ।शब्द ही जगती का श्रृंगार,शब्द से जीवन है साकार।शब्द से अर्थ नहीं है विलग,शब्द से सुंदर भाव सजग।शब्द का जैसा करो प्रयोग,वैसा ही होता है उपयोगी।...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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Laxmirangam: चाँदनी का साथ

Laxmirangam: चाँदनी का साथ: चाँदनी का साथ चाँद ने पूछा मुझे तुम अब रात दिखते क्यों नहीं? मैंने कहा अब रात भर तो साथ है मेरे चाँदनी. क्या पता तुमको, मैं कितना ......  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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केवल पल ही सत्य है

हर पलकहता है कुछफुसफुसा करमेरे कानों मेंमैं जा रहा हूँजी लो मुझेचला गया तोफिर लौट न पाऊंगाबन जाऊंगा इतिहासकरोगे मुझे यादमेरी याद मेंकर दोगे फिर एक पल बर्बादइसलिए हर पल को जियोउठो सीखो जीना...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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अस्तित्व

क्या यही संसार है?क्या यही जीवन है?झुठलाना चाहती हूंइस सत्य कोपाना चाहती हूंउस छल कोजो भटका देता हैछोटी सी नौका कोइस विस्तृत जलराशि मेंडूब जाती है नौकाखो देती है अपनाअस्तित्व......!भुला देता है ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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एक ग़ज़ल : कौन बेदाग़ है---

एक ग़ज़लकौन बेदाग़ है  दाग़-ए- दामन नहीं ?जिन्दगी में जिसे कोई उलझन नहीं ?हर जगह पे हूँ मैं उसकी ज़ेर-ए-नज़रमैं छुपूँ तो कहाँ ? कोई चिलमन नहींवो गले क्या मिले लूट कर चल दिएलोग अपने ही थे कोई दुश्मन नहीं...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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चन्द माहिया : क़िस्त 54

चन्द माहिया  :क़िस्त 54:1:ये कैसी माया हैतन तो है जग मेंमन तुझ में समाया है:2:जब  तेरे दर आयाहर चेहरा मुझ कोमासूम नज़र आया:3:ये कैसा रिश्ता हैदेखा कब उसकोदिल रमता रहता है:4:बेचैन बहुत है दिलकब तक मैं ...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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चिड़िया: क्षितिज

चिड़िया: क्षितिज: जहाँ मिल रहे गगन धरा मैं वहीं तुमसे मिलूँगी, अब यही तुम जान लेना राह एकाकी चलूँगी । ना कहूँगी फ़िर कभी कि तुम बढ़ाओ हाथ अपना, ......  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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"हिन्दी" (अतुल बालाघाटी)

दया सभ्यता प्रेम समाहित जिसके बावन बरनों मेंशरणागत होती भाषाएं जिसके पावन चरनों मेंजिसने दो सौ साल सही है अंग्रेजों की दमनाईधीरज फिर भी धारे रक्खा त्याग नहीं दी गुरताईतुमको अब तक भान नहीं ह...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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एक ग़ज़ल : झूठ का जब धुआँ-----

एक ग़ज़ल :झूठ का जब धुआँ ये घना हो गयासच  यहाँ बोलना अब मना हो गयाआईना को ही फ़र्ज़ी बताने लगेआइना से कभी सामना हो गयारहबरी भी तिजारत हुई आजकलजिसका मक़सद ही बस लूटना हो गयाजिसको देखा नहीं जिसको जान...  और पढ़ें
2 माह पूर्व
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अमन चाँदपुरी के दोहे

दोहे ~दोहा-दोहा   ग्रंथ-सा,  भाव-बिंब   हों  खास।पूर्ण करो माँ शारदे, निज बालक की आस।।संगत सच्चे साधु की, 'अमन'बड़ी अनमोल।बिन पोथी, बिन ग्रन्थ के, ज्ञान चक्षु दे खोल।।मुँह  देखें  आशीष...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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चन्द माहिया : क़िस्त 53

चन्द माहिया  :क़िस्त 53:1:सब क़िस्मत की बातेंकुछ को ग़म ही ग़मकुछ को बस सौग़ातें:2:कब किसने है मानाआज नहीं तो कलसब छोड़ के है जाना:3:कब तक भागूँ मन सेदेख रहा कोईछुप छुप के चिलमन से:4:कब दुख ही दुख रहतावक़्त क...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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एक ग़ज़ल

गजलआँखमेरीभलेअश्कसेनमनहींदर्दमेरामगरआपसे  कमनहींयेचिराग-ए-मुहब्बतबुझादेमेराआँधियोंमेअभीतकहैवोदमनहींइन्कलाबीहवाहोअगरपुरअसरकौनकहताहैबदलेगामौसमनहींपेशवोभीखिराज़-ए-अक़ीदतकिए...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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एक व्यंग्य गीत : नेता बन जाओगे प्यारे--

"छुट-भईए"नेताओं को समर्पित ----"एक व्यंग्य गीत :- नेता बन जाओगे प्यारे-----😀😀😀😀😀पढ़-लिख कर भी गदहों जैसा व्यस्त रहोगेनेता बन जाओगे ,प्यारे ! मस्त रहोगेकौए ,हंस,बटेर आ गए हैं कोटर मेंभगवत रूप दिखाई दे...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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चन्द माहिया [सावन पे] : क़िस्त 52

चन्द माहिया  [सावन पे ] : क़िस्त 52[नोट : मित्रो ! विगत सप्ताह सावन पे चन्द माहिए [क़िस्त 51] प्रस्तुत किया थाउसी क्रम में -दूसरी और आखिरी कड़ी प्रस्तुत कर रहा हूँ--]:1:जब प्यार भरे बादलसावन में बरसेभींगे त...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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चन्द माहिया सावन पे : क़िस्त 51

चन्द माहिया  [सावन पे ] : क़िस्त 51:1:सावन की घटा कालीयाद दिलाती हैवो शाम जो मतवाली:2:सावन के वो झूलेझूले थे हम तुमकैसे कोई भूले:3:सावन की फुहारों सेजलता है तन-मनजैसे अंगारों से;4:आएगी कब गोरी ?पूछ रही ...  और पढ़ें
3 माह पूर्व
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एक ग़ज़ल : ये आँधी,ये तूफ़ाँ--

एक ग़ज़ल : ये आँधी ,ये तूफ़ाँ--ये आँधी ,ये तूफ़ाँ ,मुख़ालिफ़ हवाएँभरोसा रखें, ख़ुद में हिम्मत जगायेंकहाँ तक चलेंगे लकीरों पे कब तकअलग राह ख़ुद की चलो हम बनाएँबहुत दूर तक आ गए साथ चल करये मुमकिन नहीं अब कि ह...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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चन्द माहिया : क़िस्त 50

चन्द माहिया : क़िस्त 501पल जो भी गुज़र जाताछोड़ के कुछ यादेंफिर लौट के कब आता ?2होता भी अयाँ कैसेदिल तो ज़ख़्मी हैकहती भी ज़ुबाँ कैसे ?3 तुम ने मुँह फेरा हैटूट गए सपनेदिन में ही अँधेरा है4शोलों को भड़काना...  और पढ़ें
4 माह पूर्व
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