अपना ब्लॉग जोड़ें

अपने ब्लॉग को  जोड़ने के लिये नीचे दिए हुए टेक्स्ट बॉक्स में अपने ब्लॉग का पता भरें!
आप नए उपयोगकर्ता हैं?
अब सदस्य बनें
सदस्य बनें
क्या आप नया ब्लॉग बनाना चाहते हैं?
नवीनतम सदस्य

नई हलचल

जीवन की इस राह में कभी भी ,कहीं भी अन्धकार में प्रकाश को खोजा जा सकता है...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
Himanshu
आँगन.. जो बाहर होकर भीतर है
64

तुम फ़िर आना .....

तुम फ़िर आनाहम फ़िर बैठेंगे चल करजमुना की ठंडी रेत परऔर करेंगे बातेंदेर तककविता की,कहानियों कीऔर तितलियों की तरहउड़ती फिरती लड़कियों की।तुम फ़िर आनामौसम के बदलने की तरहहम फ़िर बैठेंगे चल करकंप...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
SHRI BILAS SINGH
कविता के बहाने
105

मौत जिंदगी में तब्दील होती जा रही है

________________________________________________________"अनवर भाई की कहानी ख़ुद उनकी जुबानी......."वक़्त के कगार पर अलसाई सी मौत खड़ी है। अपने नरमीले हांथों से जिंदगी को गुदगुदाती,जिंदगी पर हंसती, मुस्कुराती,उसे पागल बनाती। कुछ ऐसे ज...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
Ritesh
Satya: The Voice of Truth
94

तू क्यूककर लिखता है

मेराजन्मउत्तरप्रदेशकेखड़ीबोलीकहेजानेवालेमेंरठजिलेमेंहुआ।लेकिनपढ़ाईमईकीभूमिबनाइलाहाबाद।प्रयागमेंलगीमहादेवीवर्माजीकीप्रतिमाहमेशाहीमुझेउत्सुककरतीकीमैंभीकुछलिखाकरूँ।बेहदख...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
Ritesh
Satya: The Voice of Truth
75

क्या ये मीटर में हैं!

देखिये रदीफ और काफिया! ये ज़रूर बताएं कि ये मीटर में हैं या नहीं। ये संभव और वैभव है मेरे जुड़वाँ बेटे।...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
प्रकाश बादल
प्रकाश बादल
107

ज़ख़्म दिल का मेरे तुम हरा मत करो

शायिरा: असमा 'शब' आगराज़ख़्म दिल का मेरे तुम हरा मत करोबेरूख़ी से मिलो तो तुम मिला मत करोवह अगर...[यह काव्य का सारांश है, पूरा पढ़ने के लिए फ़ीड प्रविष्टी शीर्षक पर चटका लगायें...]...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
विनय प्रजापति 'नज़र'
ग़ज़लों के खिलते गुलाब
158

स्वयं को मेरा बना जाओ तुम.....

साँसो में तुम रहो,यादों में तुम रहोमेरे दिल में रहो ,बस रहती रहोइस से ज्यादा भी क्या ,हँसी एहसास होमैं भी सुनता रहूँ ,तुम भी कहती रहोतन में भी मन में भी बस समां जाओ तुमरूप की सम्पदा यूँ लुटा जाओ त...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
Himanshu
आँगन.. जो बाहर होकर भीतर है
103

प्रेम का अंतहीन सफर

LOVE IS NOT A RELATIONSHIP Love relates, but it is not a relationship। A relationship is something finished। A relationship is a noun; the full stop has come, the honeymoon is over। Now there is no joy, no enthusiasm, now all is finished. You can carry it on, just to keep your promises. You can carry it on because it is comfortable, convenient, cozy. You can carry it on because there is nothing else to do. You can carry it on because if you disrupt it, it is going to create much trouble fo...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
Himanshu
आँगन.. जो बाहर होकर भीतर है
122

motivation

A man found a cocoon of a butterfly. One day a small opening appeared. He sat and watched the butterfly for several hours as it struggled to force its body through that little hole. Then it seemed to stop making any progress. It appeared as if it had gotten as far as it could, and it could go no further.So the man decided to help the butterfly. He took a pair of scissors and snipped off the remaining bit of the cocoon.The butterfly then emerged easily. But it had a swollen body and small, shrive...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
Himanshu
आँगन.. जो बाहर होकर भीतर है
107

चल सको तोः चलो

safar mein dhoop to hogi jo chal sako to chalosabhi hain bheed mein tum bhi nikal sako to chaloidhar udhar kai manzil hain chal sako to chalobane banaaye hain saaNche jo Dhal sako to chalokisi ke waasate raahen kahaaN badalati haintum apane aap ko Khud hi badal sako to चलो yahaaN kisi ko koi raastaa nahi deta mujhe giraake agar tum sambhal sako to chaloyahi hai zindagi kuchh Khaak chand ummeeden inhi khilono se tum bhi bahal sako to chalohar ik safar ko hai mahafoos raaston ki talaash hifa...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
Himanshu
आँगन.. जो बाहर होकर भीतर है
124

एक स्वपन आँख में आया था

एकस्वपनआँखमेंथा।कोख में उसे छुपाया था ।कुछ दिन भी न छिप पाया , झट गोद में आकर मुस्काया।हसी खेल में गोद से भी खिश्का मेराआँचल था ।मै जरा ठिठका फ़िर आँचल तक सिर से फिसला ।जब घर से बाहर वो निकला था...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
Ritesh
Satya: The Voice of Truth
81

...बहरे आवाज़ों के बीच।

स्कूल डायरी से एक और ग़ज़ल आपकी नज़र कर रहा हूँ: कई रोज़ हो बेशक ठहरे आवाज़ों के बीच।क्या माने रखते हैं बहरे आवाज़ों के बीच॥चुपके से वो सन्नाटों में ज़हर घोल कर चले गये,आप दे रहे हैं पहरे आवाज़ों के बीच।...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
प्रकाश बादल
प्रकाश बादल
102

स्टोव! मेरे स‌वालों का जवाब दो

स्टोव तुम स‌सुराल में ही क्यों फटा करते हो?मायके में क्यों नहीं ?स्टोव तुम्हारी शिकार बहुएं ही क्यों होती हैं?बेटियां क्यों नहीं ?स्टोव तुम इतना भेदभाव क्यों करते हो ?स‌मझते क्यों नहीं ?स्टोव ...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
RAVINDRA RANJAN
आशियाना Aashiyana
104

....चोंच में घर.....

आज अचानक एक डायरी हाथ लगी, जो उस समय की थी जब मैं स्कूल में पढ़ता था, उस डायरी में कई रचनाएं मिली जिनमेंसे अधिकतर खारिज कर दी लेकिन कुछ मुझे अच्छी लगीं उनमें से एक रचना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा ह...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
प्रकाश बादल
प्रकाश बादल
105

पूर्ण

(८ मार्च - महिला दिवस के अवसर पर )पूर्णतुम मुझसे डरो !क्योंकि मैं खुद को रोकना नहीं जानती.तुम मुझसे डरो !क्योंकि मैं समस्याओं के टीले पर खडी होकर भीउन्मादित हो हंसती हूँ.तुम डरो !क्योंकि तुम्हार...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
73

आईना

आईनाकाश !कि तुम आईना ही बन जाते ,मैंठिठकी खड़ी रहती ,औरतुम मेरा चेहरा पढ़ पाते ,मेरे एक एक भाव सेहोती रहती मैं ज़ाहिर ,तुमअपलक निहारते मुझेऔरबांछ्ते मेरे माथे की लकीर ,मेरे हाथ बढ़ाए बिनातुममुझे एक...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
83

एकाकार

एकाकारएक आकार बनमेरे मानस में तुम्हारा स्थापनमुझे ठहरा गया है.न अब कोई प्रतीक्षा है.न भय है तुम्हारे जाने का.मेरी दीवारें भीअब तुम्हें खूब पहचानती हैंमहका करती हैं वोतुम्हारी खुश्बू की भां...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
75

सूत सी इच्छाएं...

सूत सी इच्छाएं...रोते रोतेजी चाहता है,मोम की तरह गलती जाऊं.दीवार से चिपककरउसमें समा जाऊं.पर क्या करुं!हाड-मांस की हूं जो!जलने पर बू आती है.औरसामने खडा वोमुझसे दूर भागता है.मेरी सूत सी इच्छाओं को...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
77

कुत्ता कहीं का...

2009 कब का आ चुका है। दो महीने गुजर भी चुके हैं। अचानक याद आया कि इस स‌ाल अभी तक हमने कुछ लिखा ही नहीं। स‌ोच रहा हूं कहीं लिक्खाड़ लोग मुझे बिरादरी स‌े बाहर न कर दें। इसीलिए कुछ तो लिख ही डालता हूं। ...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
RAVINDRA RANJAN
आशियाना Aashiyana
95

अब इस कदर भी उजाले न हो---

इस कदर भी उजाले न हो।घर आग के निवाले न हो।प्यासे हलक से गुज़रे न जब तलक,नदी समन्दर के हवाले न हो।बोल प्यार के हों ग़ज़ल की राह में,मस्जिद न हो और शिवाले न हो।सूरज अबके ऐसी भी धूप न बाँटे,कि पहाड़ पर बर...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
प्रकाश बादल
प्रकाश बादल
106

तुम मेरे पास हो...

तुम मेरे पास हो...तुम ख्याल बन,मेरी अधजगी रातों में उतरे हो।मेरे मुस्काते लबों से लेकर...उँगलियों की शरारत तक।तुम सिमटे हो मेरी करवट की सरसराहट में,कभी बिखरे हो खुशबू बनकर...जिसे अपनी देह से लपेट,...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
71

जमाव

जमावतमतमाये सूरज ने मेरे गालों से लिपटी बूंदें सुखा डालीं.ज़िन्दगी !तूने जो भी दिया...उसका ग़म अब क्यों हों?मैं जो हूँकुछ दीवारों और काँच के टुकड़ों के बीच.जहाँ चन्द उजाले हैं.कुछ अंधेरे घंटे भी.क...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
78

इस शहर की भीड़ में पहचान बनने निकला हूँ.........

इस शहर की भीड़ में पहचान बनने निकला हूँ........................कहीं टूटा है एक तारा आसमान से उसे चाँद बनने निकला हूँ।तो क्या हुआ जो जिन्दगी हर कदम पर मारती है ठोकर।हर बार फ़िर संभल कर मै उसे एक अरमान बनने निक...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
Ritesh
Satya: The Voice of Truth
85

...और बातें हो जायेंगी

...और बातें हो जायेंगीआओ...हम साथ बैठें।पास बैठें।कभी खोलूँकभी पहनूँ मैं अपनी अँगूठी।तुम्हारे चेहरे को टिकाएतुम्हारी ही कसी हुई मुट्ठी।चमका करे धुली हुई मेज़हमारे नेत्रों के अपलक परावर्तन स...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
65

जब चमक उट्ठे तेरी याद के जुगनू कितने

शायिर: बेदिल संभलीजब चमक उट्ठे तेरी याद के जुगनू कितनेख़ून बन-बनके गिरे आँख के आँसू...[यह काव्य का सारांश है, पूरा पढ़ने के लिए फ़ीड प्रविष्टी शीर्षक पर चटका लगायें...]...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
विनय प्रजापति 'नज़र'
ग़ज़लों के खिलते गुलाब
121

इस बार

इस बारअनगिनत आँगनअनगिनत छत,अनगिनत दियेऔर उनके उजालों का कोलाहल..इनके बीचकहीं गुम सी मैं,कहीं भागने की हठ करता हुआलौ सा मचलता मेरा मन...वो एकाकीजो तुम्हारे गले लग करमुझसे लिपटने आया हैउसकी तपि...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
73

अस्तित्व

अस्तित्वमुझसे वो पूछता हैकि अब तुम कहाँ हो?घर के उस कोने सेतुम्हारा निशां धुल गयाहै वो आसमां वीरां,जहाँ भटका करती थी तुम,कहाँ गया वो हुनरखुद को उढ़ेलने का?अपनी ज़िन्दगी का खाँचा बनाशतरंज की गोट...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
73

कारीगरी है जिनकी यहाँ कोठियों के बीच

शायिर: विजेन्द्र सिंह 'परवाज़'कारीगरी है जिनकी यहाँ कोठियों के बीचहारे थके पड़े हैं कहीं सिसकियों...[यह काव्य का सारांश है, पूरा पढ़ने के लिए फ़ीड प्रविष्टी शीर्षक पर चटका लगायें...]...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
विनय प्रजापति 'नज़र'
ग़ज़लों के खिलते गुलाब
116

अनुरोध

अनुरोधहे बादल!अब मेरे आँचल मेंतृणों की लहराई डार नहीं,न है तुम्हारे स्वागत के लियेढेरों मुस्काते रंग.मेरा ज़िस्मईंट और पत्थरों के बोझ के तलेदबा है.उस तमतमाये सूरज से भागकरजो उबलते इंसानइन छत...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
74

व्यर्थ विषय

व्यर्थ विषयक्षणिक भ्रमित प्यार पाकर तुम क्या करोगे?आकाशहीन-आधार पाकर तुम क्या करोगे?तुम्हारे हीं कदमों से कुचली, रक्त-रंजित भयी,सुर्ख फूलों का हार पाकर तुम क्या करोगे?जिनके थिरकन पर न हो रोन...  और पढ़ें
10 वर्ष पूर्व
AJANTA SHARMA
अजन्ता शर्मा
69


Postcard
फेसबुक द्वारा लॉगिन